कोई समझे

चांदनी रात में खिड़की के पास बैठा व्यक्ति, यादों में खोया, हल्की रोशनी और भावनात्मक माहौल

उमा पाटनी अवनी, प्रसिद्ध साहित्यकार, पिथौरागढ़

कोई समझे निगाहों की छेड़खानी भी
वो बयां करते इश्क़ को जबानी भी

हकीक़त के लिबास ओढ़ते जब भी
याद आये ख्वाहिशों की रवानी भी

रफ्ता-रफ्ता दौड़ रही जिंदगी की घड़ी
अफसानों की बारात होती है जवानी भी

कुछ किस्से जमा कर रखे हैं अदब से
छोङ जाएंगे उसमें अपनी निशानी भी

अम्मी के आंचल से लिपटकर रोये
गुड़िया कभी होती सयानी भी

खंजरों ने रचा मुक़द्दर का हुस्न
कुबूल है ऐसी मेहरबानी भी

ख़ते-तक्दीर अपनी सँवार लो जनाब
जिंदगी रात है रात रानी भी

5 thoughts on “कोई समझे

  1. बहुत सुंदर रचना।इस तरह के काव्य और रचनाएं इस मोबाइल और रिल्स की दुनिया में को सी गई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *