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काले बादल

अधूरे प्रेम और नए वैवाहिक रिश्ते की भावनाओं को दर्शाता यथार्थवादी दृश्य कभी-कभी बीते प्रेम के बादलों के छँटने पर ही किसी नए रिश्ते की रोशनी दिखाई देती है।

मीनाक्षी वर्मा

सीमा और कार्तिक की नई-नई शादी हुई थी। परिवार के एक शादी समारोह में गए तो विपिन आगे ही खड़ा मिला। कार्तिक चौंका, “अरे विपिन, तू! कैसा है? बड़े दिनों बाद!”

सीमा भी अचकचा गई। एकटक देखती रही। विपिन की नज़र भी उससे न हटी।

कार्तिक ने सीमा की ओर इशारा करते हुए कहा, “अरे, इनसे मिलो, मेरी वाइफ सीमा।”

“नमस्ते।”

“नमस्ते।”

कार्तिक बोला, “तुम क्या एक-दूसरे को जानते हो?”

विपिन टोकते हुए बोला, “नहीं…”

सीमा भी अटककर बोली, “न… नहीं तो! मैं क्यों जानूँगी? ये आपके दोस्त हैं।”

विपिन बीच में ही बोला, “मैं अभी आया, शायद चाचाजी बुला रहे हैं।” और आगे बढ़ गया।

एक तरफ जाकर उसकी आँखें भर आईं, जैसे पिछला सारा वाकया, सारा प्यार एक रील में तैर गया हो।

विपिन और सीमा कॉलेज में पढ़ा करते थे। विपिन थोड़ा-बहुत सीमा को चाहता भी था, पर सीमा के दूसरे सपने थे। वह पढ़-लिखकर अच्छे पैसे वाले घर में शादी करना चाहती थी और वही उसने किया भी। विपिन ने इज़हार भी किया, लेकिन सीमा उसको मना कर देती थी। विपिन उसे कई बार मनाने की कोशिश करता कि वह उसे कितना प्यार करता है। कभी फूल लाकर, कभी ग्रीटिंग कार्ड देकर, लेकिन सीमा पर कोई असर नहीं हुआ।

सीमा की उड़ान बहुत ऊँची थी और विपिन ज़मीन पर रहने वाला, एक मामूली मध्यमवर्गीय इंसान था। धीरे-धीरे विपिन ने भी सीमा को छोड़ दिया। उसने एक नौकरी कर ली। प्राइवेट फर्म थी, अच्छी-खासी आमदनी थी। परिवार में माँ-बाप और छोटी बहन का गुज़ारा अच्छे से हो रहा था।

कभी-कभी विपिन को सीमा की याद आती। उसकी माँ थोड़ा-बहुत भाँप गई थी। माँ ने एक रिश्ता भी ढूँढ़ा और विपिन को तस्वीर दिखाई, “देख बेटा, यह लड़की है। इसका नाम चित्रा है।”

बीच में ही विपिन ने टोका, “माँ, मुझे शादी नहीं करनी।”

माँ बोली, “क्यों भला? क्यों नहीं करनी शादी?”

“माँ, यह सवाल मत पूछो। मैं अभी नहीं कर सकता।”

माँ की आँखों में आँसू भर आए, “बेटा, मैं मर जाऊँगी तो तेरा ख्याल कौन रखेगा?”

बेटा परेशान हो गया, “माँ, ऐसे मत बोलो। तुमको कुछ नहीं होगा।”

“बेटा, तुझे पता है ना, मुझे शुगर, हाई बीपी रहता है और कितनी बार इतनी तबीयत खराब रहती है कि मैं बिस्तर से उठ नहीं पाती। ऐसे में तुझे अकेला कैसे देखूँ?”

“माँ, तेरी यही ज़िद है तो ठीक है। किसी भी लड़की से बोलेगी, उसी से शादी कर लूँगा।”

माँ आँसू पोंछकर मुस्कुराकर बोली, “बेटा, मैं आज ही तेरे पिताजी से बात करती हूँ। वह चित्रा के पिताजी से मिलेंगे।”

“जैसा तुम्हें ठीक लगे, माँ।”

दोनों के परिवारों का मिलना हुआ। चित्रा को भी विपिन पसंद आया और विपिन तो हाँ कर ही चुका था। अच्छा मुहूर्त देखकर दोनों की शादी पक्की हो गई, पर विपिन अभी भी उदास था। उसके मन में सीमा बसी हुई थी। वह जानता था, सीमा कभी वापस नहीं आएगी। वह अपनी दुनिया में खुश थी।

घर में शादी की तैयारी होने लगी। सारे परिवारजनों को सम्मिलित कर धूमधाम से शादी हो गई।

चित्रा लाल शादी का जोड़ा पहने, हाथों में लाल मेहंदी रचाए, चूड़ा पहने घर के आँगन में आ गई। उसके आने से जैसे बहार आ गई हो। वह सुबह जल्दी उठ जाती, माँ जी की रसोई में हाथ बँटाती। माँ उसे टोकतीं, “अरे, अभी तेरी नई शादी हुई है। मेहंदी का रंग तो उतर जाने दे!”

“रंग भी उतर जाएगा, माँ जी। आप आराम करिए, खाना मैं बना दूँगी।”

यह कहकर चित्रा माँ को आराम से पकड़कर कमरे की तरफ ले जाती, “आप बैठिए, मैं अभी चाय बना लाती हूँ।”

माँ भी खुश थीं।

सब ठीक चल रहा था, पर विपिन और चित्रा में दूरी थी। विपिन उसे अपना नहीं पा रहा था, पर वह सब देख रहा था कि चित्रा घर सँभालती और उसके माँ-पिताजी का सम्मान करती थी।

एक दिन चित्रा के मायके से खबर आई कि चित्रा के पिताजी गुज़र गए। चित्रा ने सुना तो वह बहुत रोई। सभी जन मायके गए। चित्रा के भाई और माँ से दुख जताया। क्रिया-कर्म वगैरह हुआ और सभी घर लौट आए।

चित्रा उस रात रोती रही। विपिन का भी मन उदास हो गया। उसने चित्रा को बाँहों में ले लिया। दोनों के बीच की दूरियाँ समाप्त हो गईं।

अगले दिन सुबह चित्रा देर से उठी। विपिन ने उसे प्यार से पास बिठाया और कहा, “चित्रा, जो हो चुका है, उसे बदला नहीं जा सकता, पर मैं वायदा करता हूँ, तुमको कभी उदास नहीं होने दूँगा। तुम सिर्फ मेरी पत्नी नहीं, ज़िम्मेदारी भी हो। तुम इस घर की नींव हो और मेरी प्रिया…”

यह कहकर उसके होंठ चूम लेता है। चित्रा शर्मा कर हट जाती है।

आसमान में काले बादल अब छँट चुके थे। विपिन के जीवन और दिल में चित्रा अपना घर बसा चुकी थी।

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