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अंजू निगम : अपनी आवाज़ की तलाश में

anjy nikam

लघुकथा से आकाशवाणी तक और साझा संग्रहों से एकल पुस्तकों तक
एक प्रतिभाशाली लेखिका का आत्मविश्वास भरा सफर

suresh parihar

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे

कुछ यात्राएँ किसी तय मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं, बल्कि रास्ते में अपने भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने के लिए होती हैं. सात वर्षों की साहित्यिक यात्रा भी ऐसी ही एक यात्रा है, जिसमें शब्द धीरे-धीरे अभिव्यक्ति से आगे बढ़कर जीवन का जरूरी हिस्सा बन जाते हैं. 2018 में लेखन की शुरुआत करने वाली अंजू निगम ने लघुकथा, कहानी, कविता, गीत, ग़ज़ल, हाइकु, आलेख और संस्मरण जैसी अनेक विधाओं में अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज की. देश के प्रमुख समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होने से लेकर आकाशवाणी पर अपनी रचनाओं के प्रसारण तक, उनकी यात्रा में उपलब्धियों के साथ वह निरंतर आत्ममंथन भी दिखाई देता है, जिसने उनके लेखन को आकार दिया. प्रस्तुत है अपने नाम से पहचाने जाने की ख्वाहिश रखने वाली एक प्रतिभाशाली लेखिका से लाइव वॉयर न्यूज के संपादक सुरेश परिहार से बातचीत के प्रमुख अंश-

प्रश्न- सात वर्षों से लगातार लेखन और प्रकाशन की यात्रा में ऐसा कौन-सा क्षण था, जब आपको पहली बार लगा कि साहित्य अब आपके लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन का जरूरी हिस्सा बन चुका है?
उत्तर-
मैंने 2018 में अपनी लेखन यात्रा शुरू की. शुरुआत में मुझे ऐसा मंच चाहिए था जिसके द्वारा मैं अपने मन को जिन भावों को शब्द पहना रही हूँ वे पाठकों तक पहुँचे लेकिन जब मेरी उसी अभिव्यक्ति को पाठकों द्वारा सराहा गया तो मुझे लगा कि मैं अपने लेखन द्वारा ही सही, समाज को कुछ सार्थक दे सकती हूँ. ये सोच इसलिए भी बनी क्योंकि मेरी लघुकथाओं में त्वरित समाज के ज्वलंत मुद्दे होते है.

प्रश्न- आपने लघुकथा, कहानी, कविता, गीत, गजल, हाइकु, आलेख और संस्मरण जैसी कई विधाओं में लिखा है. इतनी विविध विधाओं के बीच आपकी अपनी रचनात्मक आवाज किस विधा में सबसे सहज महसूस करती है और क्यों?
उत्तर-
मैं किसी भी विधा में लिखूँ, हमेशा कोशिश करती हूँ कि जो भी लिखा जा रहा है वह गुढ़ हो , खरा हो और सच के एकदम करीब हो. जैसे माँ को अपने सभी बच्चे प्यारे होते हैं लेकिन एक संतान माँ के ज्यादा करीब होती है वैसे ही मुझे कहानी लिखने में ज्यादा सहजता लगती है क्योंकि इसमें बिना किसी बंधन के निर्भीक होकर मैं अपना रचनाकर्म कर सकती हूँ. कहानी लेखन करना मेरे लिए वैसा ही है जैसे किसी चित्रकार के लिए बड़ा कैनवास जिसमें वह अपनी प्रतिभा को वृहद स्तर पर निखार सकता है.

प्रश्न- आपकी रचनाएँ देश के प्रमुख समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं. पहली बार किसी प्रतिष्ठित प्रकाशन में अपनी रचना छपने का अनुभव कैसा था और क्या उस अनुभव ने आपके लेखन के प्रति आपका आत्मविश्वास बदला?
उत्तर-
सर्वप्रथम दैनिक जागरण की पत्रिका मधुरिमा में जब करवाचौथ के अवसर पर मेरे द्वारा भेजा गया संस्मरण छपा तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि इतनी प्रतिष्ठित पत्रिका में मैं छप सकती हूँ. उसके पहले मैं छपती तो रही मगर कुछ बड़ा पा लेने जैसा आत्मविश्वास नहीं जाग पाया. इस संस्मरण के छपने के बाद ही मुझे लगा कि मुझमें कुछ काबिलियत तो है. इस भावना ने मुझे बहुत अच्छा लिख लेने को उत्साहित किया.

प्रश्न- आपके एकल लघुकथा संग्रह साझा दर्द और यात्रा-वृत्तांत सफर की लकीरें दो अलग-अलग रचनात्मक संसार सामने रखते हैं. इन दोनों पुस्तकों के पीछे लेखक के रूप में आपके अनुभव और संवेदनाएँ किस तरह अलग रही हैं?
उत्तर
-चूंकि मैंने अपना कहानी और लघुकथा से ही शुरू किया था और मेरी दिली इच्छा भी रही कि मेरा नाम किसी किताब के कवर पृष्ठ पर लेखक के रूप में छपे. लेखन के शुरुआती दौर में मैंने अलग-अलग विषय पर काफी लघुकथाएं लिखी. इन्हें एक जगह संचित करके पाठकों तक पहुँचाना मेरा सपना था.मेरे ख्याल से लेखन के भी कई फेज होते है. पहले मेरी रूचि लघुकथा की ओर ज्यादा रही. फिर अपनी यात्राओं के अनुभव को समेटने में मेरी अदम्य इच्छा रही जो यात्रा -वृत्तांत की किताब के रूप में समक्ष आई. व्यक्तिगत तौर पर मुझे हमेशा से पुराने किलों, मंदिरों , ऐतिहासिक स्थानों को देखने-समझने में बेहद रूचि थी. पति की नौकरी भी मेरी इस इच्छा को पूर्ण करते जाने में सहायक रही.
जैसे कुछ प्रारब्ध होते है कि हर कार्य के होने का समय तय होता है. ऐसे ही जब मैंने फतेहपुर सीकरी को देखा समझा, उसी वक्त इसे कलमबद्ध कर लेने की तीव्र इच्छा हुई और मैंने एक महीने में बारह स्थानों के बारे में लिख लिया. ये सिलसिला चार महीने चला और उस दौरान हुई प्रत्येक यात्रा का श्रमसाध्य कार्य मैंने पूर्ण किया. कहूँ तो यात्रा-विवरण लिखना मुझे बेहद रास भी आया और इस पुस्तक को मैंने बड़ी बारीकी से गढ़ा.

प्रश्न- लघुकथा में कम शब्दों में जीवन की बड़ी सच्चाई कहनी होती है. आपके लिए एक प्रभावी लघुकथा की सबसे जरूरी शर्त क्या है और रचना लिखते समय आप कथ्य, अंत और संवेदना के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं?
उत्तर-
एक प्रभावी लघुकथा लिखने के लिए शब्द संयोजन, कथ्य, शिल्प की कसावट बहुत मायने रखती है. कालखंड दोष और लेखकीय प्रवेश रहित लघुकथाओं का सदैव स्वागत रहता है. सबसे अधिक भार लघुकथा की अंतिम पंक्तियों पर रहता है. जितना चौंका देने वाला, कसावट लिए और अनकहा रह जाने वाला अंत होगा उतना ऊँचा पायदान उस लघुकथा को मिलेगा. शीर्षक की भी एक महत्ती भुमिका रहती है.

प्रश्न- आकाशवाणी देहरादून से लघुकथा का पाठन-प्रसारण और इंदौर से तीन लघुकथाओं का प्रसारण आपके लिए किस तरह का अनुभव रहा? जब अपनी लिखी पंक्तियाँ अपनी आवाज में श्रोताओं तक पहुँचती हैं, तो लेखक के भीतर क्या बदलता है?
उत्तर-
आकाशवाणी देहरादून और इंदौर से मेरी चार कहानियों का प्रसारण हुआ था. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी कहानी आकाशवाणी से प्रसारित हो सकती है लेकिन मैंने आगे बढ़कर खुद अपने लिए रास्ता बनाया. अपनी मेहनत को मुकाम मिलना हमेशा ही सुकून पहुंचाता है. अपनी आवाज़ सुनने के लिए मुझे खासी जद्दोजहद करनी पड़ी क्योंकि मेरे पास रेडियो नहीं था. मैंने अपनी दोस्त के घर जाकर प्रसारण को रिकॉर्ड किया. रेडियो पर अपनी आवाज़ में अपनी कहानी सुनना दिवास्वप्न सा ही था.
प्रश्न- आपको यमुना सम्मान, नवलेखन सम्मान, निरंजन जमींदार स्मृति लघुकथा सम्मान सहित कई सम्मान मिले हैं और अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में आपकी रचना प्रथम रही. इनमें से ऐसा कौन-सा सम्मान है जिसने आपको भीतर से सबसे ज्यादा छुआ और क्यों?
उत्तर-
पहला सम्मान मिलना ,मेरे ख्याल किसी भी लेखक के लिए बेहद खास होता है. बाद में मिलने वाले हर सम्मान, बेशक आपके कद को बड़ा करते है और एक सम्मानित स्तर पर पहुँचाते है लेकिन प्रथम सम्मान का एक अलग रूतबा होता है.

प्रश्न- आपकी साहित्यिक यात्रा में महिला साहित्य समागम, अखिल भारतीय लघुकथा अधिवेशन और विभिन्न साहित्यिक मंचों की सहभागिता भी महत्वपूर्ण रही है. क्या साहित्यिक मंच और संगत किसी लेखक की रचनात्मक दृष्टि को बदलते हैं? आपके अनुभव में इन मंचों ने आपको क्या दिया?
उत्तर-
अपनी साहित्यिक यात्रा के हर पड़ाव ने मेरे भीतर के लेखक को और संपन्न किया. साहित्य के वृहद आकाश से अवगत करवाया. वरिष्ठ लेखकों से मिलना हमेशा मेरे ज्ञान को समृद्धि प्रदान करता रहा. मंथन और अपने लेखन को परिष्कृत करने की सुदृढ़ता मिली. वामा साहित्य मंच वह मंच था जिससे मेरा सबसे पहले जुड़ना हुआ. डाइस पर खड़े होकर बोलना मेरे लिए सपना था लेकिन इसी मंच ने मुझे की बार मंच से मुझे बोलने का मौका दिया. कार्यक्रम संचालन की बारीकियां भी इसी मंच से सीखी. कई और मंचों से जुड़ कर अपने को निखारने की प्रक्रिया तो अब भी चल रही है.

प्रश्न- आपने साझा संग्रहों में अनेक रचनाकारों के साथ जगह बनाई और अब एकल पुस्तकों तक पहुँची हैं. साझा से एकल लेखन की इस यात्रा में सबसे बड़ी चुनौती क्या रही और क्या एक लेखक के रूप में अकेली पुस्तक प्रकाशित होने के बाद अपनी रचनाओं के प्रति आपकी जिम्मेदारी बढ़ी महसूस हुई?
उत्तर
-साझा संग्रहों से शुरूआत करके एकल संग्रह तक आने का स़फर खासा मेहनत भरा रहा. एकल संग्रह निकालना खासी बड़ी जिम्मेदारी है. पुस्तक में कोई कमी न रहें, ये काम बारीकी मांगता है. खासकर प्रुफ रीडिंग बहुत धैर्य और समय माँगता है. आवरण पृष्ठ, फोंट साइज़, प्रकाशक के साथ लंबा विचार -विमर्श एक उत्तम पुस्तक का जरूरी अंग होता है. कोई भी अंश छूट जायें तो जीवन भर की खलिश रह जाती है. ये आपकी पुस्तक है तो समस्त जिम्मेदारी आपकी है.
प्रश्न- यदि आज की तारीख में आपको अपने सात वर्षों के साहित्यिक सफर को पीछे मुड़कर देखने का अवसर मिले, तो कौन-सी अधूरी इच्छा अभी भी आपके भीतर एक रचनाकार की तरह दस्तक दे रही है और आने वाले वर्षों में आप अपने लेखन को किस दिशा में ले जाना चाहती हैं?
उत्तर-
आज जब पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो ऐसी कोई अधूरी ख्वाहिश नहीं नज़र आती, ऐसा कोई अवसर नहीं दिखता जिसे मैंने छोड़ा हो. जिस रास्ते में मुझे आगे बढ़ने की संभावना दिखी मैंने उसे हाथ से जाने नहीं दिया. एक रचनाकार के रूप में मेरी यह इच्छा होती है कि मुझे वह मुकाम मिले जहाँ लोग मुझे मेरे नाम से जाने. ये ऐसी उपलब्धि रहेंगी जिसे मैं अपनी मेहनत से हासिल करना चाहूंँगी.

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