
निधि सिंह
कुछ लोग कहते हैं,
स्त्री भट्टी है,
स्त्री कोयला है,
स्त्री है ईंधन समाज के लिए।
स्त्री को स्त्री का मान देना ही
स्त्री के लिए है ज़रूरी।
क्या नहीं मिला उन्हें
अपने स्त्रीत्व का बोध?
नहीं उन्हें
अपने अधिकारों का बोध।
है विडंबना
बदलते दौर की,
बदलते समाज की,
बदलती संस्कृति की।
कब मानोगी
अपने मान को,
कब समझोगी
अपने स्त्रीत्व को?
कैसे होगा भान तुम्हें,
स्त्री होने का
अभिमान तुम्हें?
कब जागोगी?
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