
रश्मि मृदुलिका, देहरादून (उत्तराखण्ड)
कौन हो तुम,,
कर्णिका में उच्चरित मेरे,
शब्दों से भाव उड़ेलते,
व्याकुल प्राण, तृषित मन ,
मुझ में ही मुझको समेटते,
कौन हो तुम,, कहो अपराजिता,,
कहाँ से बधिर अक्षर बोल पड़ते|
प्रेमील भाव भ्रमर से डोल जाते,
मधु विरह तन- मन में घुल जाये|
प्रियतम हेतु कौन गीत गाये|
कौन हो प्रिये! कब तुम आये?
नुपूर की झनकार रस घोले,
मयूर मन का पंख खोले,
कोलाहल में रागिनी हो जैसे,
मिट्टी की सोंधी खुशबू पावनी हो जैसे,
एकाकी क्षणों की साथी हो जैसे,
कौन हो,, कहो सखे,,
मंथर कदमों से समाहित हुए,
काया – आत्मा सम दोनों हुए,,
मुझमें, मुझ जैसे ही तुम हुए,
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