वो टिफ़िन,अचार और तुम….

स्कूल के दिनों के मासूम प्यार और बचपन की यादों पर आधारित भावनात्मक हिंदी कहानी

रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)

कुछ प्रेम कहानियाँ बहुत बड़ी नहीं होतीं, लेकिन उनकी यादें उम्र से भी लंबी हो जाती हैं। वे किसी वादे, इज़हार या रिश्ते की मोहताज नहीं होतीं। वे बस दिल के किसी कोने में चुपचाप अपना घर बना लेती हैं और फिर जीवन भर वहीं बसी रहती हैं।

अनिरुद्ध को आज भी अपने बचपन का वह छोटा-सा स्कूल याद है—लाल ईंटों की इमारत, धूल से भरा मैदान, पीपल के पेड़ की ठंडी छाँव और उन्हीं गलियारों में दौड़ती एक लड़की—काव्या।

काव्या की सबसे अलग पहचान थीं उसकी शरारती आँखें। वे आँखें हर समय कुछ-न-कुछ कहती रहती थीं। कभी खिलखिलाकर हँसतीं, कभी शरारत से चिढ़ातीं, तो कभी बिना कुछ कहे ही दिल का कोई राज़ बयाँ कर जातीं।

अनिरुद्ध को कभी समझ नहीं आया कि काव्या उसे इतनी अच्छी क्यों लगती थी। उस उम्र में भला प्रेम का अर्थ कौन जानता है? बस इतना महसूस होता था कि जिस दिन काव्या स्कूल न आती, उस दिन पूरा दिन जैसे अधूरा-अधूरा-सा लगता।

दोनों अक्सर एक ही बेंच पर बैठते। कभी पेंसिल साझा करते, तो कभी अपना टिफ़िन। काव्या को आम का अचार बहुत पसंद था, इसलिए अनिरुद्ध हर दिन अपने टिफ़िन में थोड़ा-सा अचार बचाकर रखता—सिर्फ़ उसके लिए। बदले में काव्या अपनी पसंदीदा टॉफ़ी चुपके से उसकी जेब में रख देती।

उनके बीच कभी “आई लव यू” जैसे शब्द नहीं बोले गए। शायद उनकी ज़रूरत भी नहीं थी। उनकी दोस्ती में ही एक अनकहा अपनापन था, जो हर शब्द से कहीं अधिक गहरा था।

बारिश के दिनों में एक ही छतरी के नीचे घर लौटना, खेल के मैदान में एक-दूसरे को ढूँढ़ती नज़रें और परीक्षा के दिनों में एक-दूसरे की सफलता के लिए मन-ही-मन की गई छोटी-छोटी दुआएँ—यही तो उनका मासूम प्रेम था।

फिर समय ने अपनी रफ़्तार पकड़ ली।

स्कूल छूट गया।

रास्ते बदल गए।

नए शहर, नई ज़िम्मेदारियाँ और नई दुनिया उनके सामने थीं। धीरे-धीरे संपर्क भी खो गया।

लेकिन कुछ रिश्ते संपर्क से नहीं, स्मृतियों से जुड़े होते हैं।

आज अनिरुद्ध जीवन के उस मुकाम पर खड़ा है, जहाँ उसके पास बहुत कुछ है—कामयाबी, अनुभव और जीवन की परिपक्व समझ।

फिर भी, जब कभी किसी स्कूल की घंटी उसके कानों में पड़ती है या बारिश की भीनी-भीनी खुशबू हवा में घुलती है, तो उसकी स्मृतियों में सबसे पहले वही शरारती आँखें उतर आती हैं।

उसे तब एहसास होता है कि प्रेम हमेशा साथ रहने का नाम नहीं होता।

कभी-कभी प्रेम केवल एक सुंदर स्मृति होता है, जो बरसों बाद भी चेहरे पर अनायास मुस्कान बिखेर देता है।

काव्या शायद आज कहीं होगी…

अपनी दुनिया में…

अपनों के बीच…

शायद वह खुश होगी।

शायद उसे भी कभी-कभी वह पुराना स्कूल याद आता होगा।

शायद उसे भी वह लड़का याद आता होगा, जो हर दिन उसके लिए अपने टिफ़िन में थोड़ा-सा आम का अचार बचाकर रखता था।

और अगर उसे याद न भी आता हो…

तो भी क्या फ़र्क पड़ता है?

कुछ प्रेम कहानियाँ मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं बनतीं।

वे इसलिए जन्म लेती हैं, ताकि हमें यह याद दिलाती रहें कि जीवन में एक समय ऐसा भी था, जब दिल बिल्कुल मासूम था, भावनाएँ बिल्कुल सच्ची थीं और किसी की शरारती आँखों में सचमुच पूरी दुनिया दिखाई देती थी।

शायद बचपन का प्रेम ही सबसे सुंदर प्रेम होता है…

क्योंकि वह समय के साथ बदलता नहीं,

बूढ़ा नहीं होता,

और यादों में हमेशा उतना ही मासूम बना रहता है।

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