‘सबक’

एक भारतीय गली में खड़ा वफ़ादार देसी कुत्ता गुस्से से एक शराबी व्यक्ति की ओर भौंक रहा है, जबकि पास में एक वृद्ध महिला सुरक्षित खड़ी है। दृश्य साहस, सुरक्षा और मानवीय संवेदनाओं को दर्शाता है।

रश्मि लहर

आजकल तुम्हें हुआ क्या है, शेरू?”

शेरू के चेहरे पर गुस्से के भाव देखकर कल्लू ने उससे पूछा।

कोई जवाब न पाकर उसने कहा, “तुझे पता था कि ठेकेदार तपन तेरे खूंखार ढंग से भौंकने और दौड़ाने पर डर जाएगा। फिर भी तूने उसको ऐसे दौड़ाया कि वह इतनी दूर जाकर गिरा कि उसे उठाने वाला भी कोई नहीं मिला!”

फिर उसने शेरू के चेहरे पर नज़र गड़ाते हुए आगे कहा, “सुना है, तपन को बहुत चोट आई है! परसों जब गंगू चाची ज़रा-सी फिसल गई थीं, तो तूने पूरे मोहल्ले को इकट्ठा कर लिया था। सब ऐसे साथ आ गए थे कि चाची की पूरी देखभाल हो गई थी। तपन से तुझे कोई प्रॉब्लम है क्या? सच-सच बता।”

शेरू की आँखों में पलभर के लिए आँसू उमड़ आए।

“तुझे पता है, कल्लू! गंगू चाची अकेली होते हुए भी मुझे रोज़ रात में रोटी देती हैं। कल उन्हें थोड़ी देर हो गई, फिर भी वे रोटी लेकर निकलीं। मैं भूखा उनका इंतज़ार कर रहा था कि अचानक बाहर खड़े उस शराबी ने उनका हाथ पकड़ लिया! वे चीखते हुए शर्म से रो पड़ी थीं! वह तो कहो, मैं वहाँ था, तो मैंने गुर्रा-गुर्रा कर तपन को भगा दिया था!”

कहते हुए शेरू की आँखें गुस्से से लाल हो उठीं।

वह आगे बोला, “और तो और, वह अपनी गाड़ी भी ऐसे धोता है कि मेरा रखा सारा खाना बह जाता है। जब देखो, तब वह मेरी किटी को भी भगाता रहता है। मैं तो उसको काट-काटकर लहूलुहान कर देता, पर छोड़ दिया बस! उसको ‘सबक’ सिखाना बहुत ज़रूरी था!”

2 thoughts on “‘सबक’

  1. हार्दिक धन्यवाद आदरणीय संपादक महोदय!

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