दहलीज से साहित्य शिखर तक

डेस्क पर बैठकर लेखन करती हुई भारतीय शिक्षिका और कवयित्री, सामने डायरी और पुस्तकें, साहित्यिक वातावरण में प्रेरणादायक व्यक्तित्व का चित्र।

संघर्ष, समर्पण और शब्द-साधना से पहचान बनाने वाली साहित्यकार से विशेष बातचीत

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

साहित्य मन की संवेदनाओं को शब्दों में ढालने की कला है, और जब यह कला जीवन के अनुभवों, संस्कारों तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़ जाती है, तब वह पाठकों के हृदय तक सहज ही पहुँच जाती है| आज हम परिचय करा रहे हैं जमशेदपुर की एक ऐसी साहित्यकार पूनमसिंह वत्सला से जिन्होंने वर्ष 2023 से साहित्यिक लेखन की शुरुआत कर अल्प समय में ही कविता, कहानी, लघुकथा, संस्मरण, जीवनी और आलेख जैसी अनेक विधाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है| शिक्षिका होने के साथ-साथ वे एक समर्पित गृहिणी, संवेदनशील साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं. प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-

प्रश्न- सबसे पहले अपने बचपन, पारिवारिक परिवेश और माता-पिता से मिले संस्कारों के बारे में हमारे पाठकों को बताइए|
उत्तर :
हम चार भाई-बहन हैं.तीन बहनें और एक भाई| मैं सबसे छोटी हूँ, इसलिए परिवार में मुझे बहुत प्यार और दुलार मिला| मैं अपने पिताजी की विशेष लाडली थी| उन्होंने हमेशा मुझे यह शिक्षा दी कि कभी किसी की नकल मत करो, जो भी करो अपने बलबूते पर करो| मेहनत से कभी पीछे मत हटो और सदैव प्रयास करो कि किसी का भला हो सके| उन्होंने यह भी सिखाया कि किसी का बुरा कभी नहीं करना चाहिए| यही संस्कार आज भी मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं|

प्रश्न- आपके जीवन में माता-पिता के कौन-से संस्कार आज भी आपके व्यक्तित्व और लेखन में दिखाई देते हैं?

उत्तर -आज मैं जो कुछ भी हूँ, अपने माता-पिता के संस्कारों की बदौलत हूँ| उन्हीं की प्रेरणा और मार्गदर्शन ने मेरे व्यक्तित्व को निखारा और मेरी लेखन यात्रा को दिशा दी| विशेष रूप से मेरे पिताजी हमेशा मुझे प्रोत्साहित करते रहे, जिससे आत्मविश्वास बढ़ता गया और आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती रही|

प्रश्न- आपके पति और परिवार के अन्य सदस्यों का आपकी साहित्यिक यात्रा में कितना सहयोग रहा है?

उत्तर -मेरे साहित्यिक जीवन में मेरे पति और दोनों बच्चों का पूर्ण सहयोग रहा है| वे हमेशा मेरा उत्साहवर्धन करते हैं, मेरे सम्मान और उपलब्धियों पर गर्व महसूस करते हैं तथा हर परिस्थिति में मेरा मनोबल बढ़ाते हैं| मेरे पति साहित्यिक कार्यक्रमों और आयोजनों में जाने के लिए भी पूरा सहयोग करते हैं|

प्रश्न- एक शिक्षिका, पत्नी, परिवार की सदस्य और साहित्यकार के रूप में आप अपने जीवन में संतुलन कैसे स्थापित करती हैं?

उत्तर –बचपन से ही मुझे शिक्षिका बनने का बहुत शौक था| खेलते समय भी मैं अक्सर टीचर की भूमिका निभाया करती थी| मेरे पिताजी मज़ाक में कहा करते थे कि यह बड़ी होकर अवश्य शिक्षिका बनेगी, और उनकी बात सच साबित हुई| मेरी दिनचर्या सुबह पाँच बजे से शुरू होती है| घर के कार्यों को पूरा करने के बाद मैं विद्यालय जाती हूँ| जब भी समय मिलता है, कुछ न कुछ लिखने का प्रयास करती रहती हूँ| अब बच्चे अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हो गए हैं, इसलिए विद्यालय से लौटने के बाद मैं प्रतिदिन लगभग एक घंटा साहित्यिक लेखन के लिए निकालने का प्रयास करती हूँ, ताकि परिवार और साहित्य दोनों को समय दे सकूँ|

प्रश्न- साहित्य के अतिरिक्त आपकी अन्य रुचियाँ क्या हैं?

उत्तर :-मुझे संगीत सुनना बहुत पसंद है| इसके अलावा बागवानी मेरा प्रिय शौक है| खाली समय में मैं अपने पौधों की देखभाल करती हूँ और उनके साथ समय बिताना मुझे बहुत सुकून देता है|

प्रश्न- यदि लेखन और शिक्षण के अलावा आपको किसी एक क्षेत्र को अपने करियर के रूप में चुनना होता, तो वह कौन-सा क्षेत्र होता और क्यों?

उत्तर -मैं डॉक्टर बनना पसंद करती, क्योंकि दूसरों की सेवा करना, उनकी सहायता करना और उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना मुझे अत्यंत अच्छा लगता है| इससे मन को बहुत संतोष मिलता है| यद्यपि मैं डॉक्टर नहीं बन सकी, लेकिन भोजपुरी फिल्म में डॉक्टर की भूमिका निभाकर अपने इस शौक को कुछ हद तक पूरा किया|

प्रश्न- आपकी दिनचर्या कैसी रहती है?
उत्तर
:मेरी दिनचर्या पूरी तरह अनुशासित है| सुबह पाँच बजे उठकर घर की साफ-सफाई, नाश्ता तैयार करना, स्नान और पूजा-पाठ करने के बाद विद्यालय जाती हूँ| विद्यालय से लौटकर परिवार के लिए भोजन बनाती हूँ| कुछ समय विश्राम के बाद शाम को अपने बगीचे में पौधों की देखभाल करती हूँ| संध्या आरती के पश्चात शाम सात से आठ बजे तक लेखन करती हूँ और फिर घर के अन्य कार्यों में व्यस्त हो जाती हूँ|
प्रश्न- क्या लेखन के लिए कोई विशेष समय या वातावरण पसंद करती हैं?
उत्तर
:रविवार का दिन मेरे लिए लेखन के लिए सबसे उपयुक्त होता है| उस दिन विद्यालय नहीं जाना होता और कामकाज का दबाव भी अपेक्षाकृत कम रहता है| सुबह चाय की चुस्कियों के साथ शांत वातावरण में लिखना मुझे बहुत आनंद देता है| अक्सर उस समय मैं एक-दो रचनाएँ लिख लेती हूँ|
प्रश्न- वर्ष 2023 से आपने साहित्य लेखन की शुरुआत की| इस दिशा में पहला कदम उठाने के पीछे कौन-सी प्रेरणा रही?
उत्तर
:मेरी एक मित्र ने मुझसे कहा कि जब मैं जीवनी, कथा और कहानियाँ लिखती हूँ, तो किसी साहित्यिक संस्था से क्यों नहीं जुड़ती| उन्होंने बताया कि वहाँ अनेक लेखक, कवि और कवयित्रियाँ मिलेंगे, जिससे सीखने और आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा| उनकी प्रेरणा से ही मेरी साहित्यिक यात्रा का औपचारिक आरंभ हुआ|

प्रश्न- कविता, कहानी, लघुकथा, संस्मरण, जीवनी और आलेख जैसी अनेक विधाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं| इनमें से कौन-सी विधा आपके सबसे अधिक करीब है?
उत्तर :
संस्मरण मेरे सबसे अधिक निकट है, क्योंकि इसमें मैं अपने जीवन की पुरानी स्मृतियों और अनुभवों को शब्दों में सहेज पाती हूँ|
प्रश्न- छंद साधना की ओर आपका रुझान कैसे विकसित हुआ?
उत्तर :-
छंद लेखन आसान नहीं होता| इसमें मात्राओं की गणना और नियमों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है| मैंने सबसे पहले दोहा लिखना सीखा| उसके बाद अन्य छंदों को समझना अपेक्षाकृत सरल हो गया| छंदों की लय और सौंदर्य मुझे बहुत आकर्षित करते हैं, इसलिए इस दिशा में मेरा रुझान लगातार बढ़ता गया|
प्रश्न- साझा संकलनों में प्रकाशित रचनाओं में कौन-सा अनुभव सबसे यादगार रहा?
उत्तर –
मेरी पहली रचना ङ्गदहलीज से आगेफ साझा संकलन में प्रकाशित हुई थी| इसके लिए मुझे रांची में सम्मान समारोह में आमंत्रित किया गया| पहली बार अपनी रचना को पुस्तक में प्रकाशित देखकर और उसके लिए सम्मान प्राप्त कर मैं अत्यंत भावुक और प्रसन्न थी| प्रसिद्ध साहित्यकार उमाकांत भारती के हाथों सम्मान प्राप्त करना मेरे लिए अविस्मरणीय अनुभव रहा|
प्रश्न-सामाजिक एवं साहित्यिक गतिविधियों में आपकी क्या भूमिका रहती है?
उत्तर –
सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट, जमशेदपुर की सचिव तथा साहित्य कुंज की कार्यकारिणी सदस्य होने के नाते जो भी जिम्मेदारियाँ मुझे सौंपी जाती हैं, उन्हें मैं पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निभाने का प्रयास करती हूँ|
प्रश्न- कौन-सा सम्मान आपके लिए सबसे अधिक भावनात्मक महत्व रखता है?
उत्तर
-एक बार मैं छंदों से संबंधित कार्यक्रम में अतिथि के रूप में गई थी| वहाँ सम्मानित होते साहित्यकारों को देखकर मेरे मन में भी छंद लेखन सीखने और उसमें दक्षता प्राप्त करने की इच्छा जागी| मैंने स्वयं से संकल्प लिया और निरंतर अभ्यास किया| बाद में जब मेरी रचना और प्रस्तुति की मंच पर सराहना हुई तथा मुझे सम्मानित किया गया, तब वह क्षण मेरे लिए अत्यंत भावनात्मक और प्रेरणादायक था|
प्रश्न-आज के युवा लेखकों और साहित्य के क्षेत्र में आने वाली महिलाओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
उत्तर :
मेरा संदेश है कि वे अपनी आवाज़ को स्वतंत्र रखें, वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करें और अपनी लेखनी के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाएँ| निरंतर सीखते रहें और आत्मविश्वास बनाए रखें|
प्रश्न- आपके साहित्यिक और व्यक्तिगत जीवन का वह कौन-सा सिद्धांत है, जिसे आप अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती हैं?
उत्तर
-मैं जो भी लक्ष्य निर्धारित करती हूँ, उसे पूरा करने का संकल्प लेती हूँ और उसे पूरा करके ही रहती हूँ| व्यक्तिगत जीवन में मेरा सिद्धांत है कि मैं ऐसा कोई कार्य न करूँ जिससे मेरी स्वयं की नज़रों में मेरा सम्मान कम हो| मैं आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने में विश्वास रखती हूँ|
प्रश्न-आपका पसंदीदा लेखक, कवि और साहित्यकार कौन है?
उत्तर :
-मेरी प्रिय लेखिका हैं महादेवी वर्मा, जबकि मेरे पसंदीदा कवि हैं हरिवंश राय बच्चन|
प्रश्न- आपकी पसंदीदा पुस्तक और कविता कौन-सी है?
उत्तर
-मेरी पसंदीदा पुस्तक है नीरजा और पसंदीदा कविता है जो बीत गई सो बात गई|
प्रश्न- यदि आपको अपने व्यक्तित्व का वर्णन तीन शब्दों में करना हो, तो वे क्या होंगे?
उत्तर :
ईमानदार, सहनशील और मेहनती|
प्रश्न- जीवन में अब तक सीखा गया सबसे बड़ा सबक क्या है?
उत्तर
:मैंने सीखा है कि किसी पर आँख मूँदकर विश्वास नहीं करना चाहिए| जीवन में विश्वास अवश्य करें, लेकिन विवेक और समझदारी के साथ|
प्रश्न-आने वाले पाँच वर्षों में आप स्वयं को किस रूप में देखना चाहेंगी?

उत्तर -मैं स्वयं को एक प्रतिष्ठित कवयित्री और साहित्यकार के रूप में स्थापित होते देखना चाहती हूँ तथा साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाना चाहती हूँ|
प्रश्न-अपने पाठकों के लिए आपका संदेश
उत्तर –
मैं अपने पाठकों से कहना चाहूँगी कि स्वयं पर विश्वास रखें, पूरी मेहनत और लगन से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ें| सफलता अवश्य आपके कदम चूमेगी| धैर्य बनाए रखें, क्योंकि निरंतर प्रयास ही मंज़िल तक पहुँचाता है|

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