अनाम बंधन

अलग-अलग आकाशों के नीचे खड़े दो व्यक्ति, दूरी के बावजूद गहरे आत्मिक जुड़ाव को दर्शाता भावनात्मक दृश्य।

मीनाक्षी पारीक, जयपुर

“ठहरे रहो”
यह आग्रह नहीं तुम्हारे लिए।

तुम जा सकते हो
इतने दूर,
कि तुम्हारे आकाश में सूर्योदय हो
और यहाँ चाँद उतर आए।

दिशाएँ बदल सकती हैं,
ऋतुएँ भी,
पर प्रकाश का स्वभाव
और जल का मूल
कभी नहीं बदलता।

तुम अपने पथ के स्वामी हो,
पर हृदय–कुटी के द्वार पर
तुम प्रहरी नहीं
वहाँ तो
कोई अर्गला ही नहीं।

न मनुहार,
न मोह का जाल
फिर भी
एक सूक्ष्म डोरी है,
रेशम-सी,
जो बाँधती नहीं,
पर अलग भी नहीं होने देती।

तुम्हारा नाम आते ही
क्षण भर ठहर जाता है समय,
शब्द दीप्त हो उठते हैं
और एक भाव
अविचल खड़ा रह जाता है।

तर्क चुक जाते हैं तब,
और मन मान लेता है
शायद
यह कोई पुरातन पहचान है।

तुम स्वप्न नहीं,
कामना भी नहीं
पर यदि जीवन की संध्या में
पुण्यसलिला के पुलिन पर
एक बार
धर दो अपने चरण,
तो उस धूलि को
प्रणाम करना ही
मेरा प्रथम
और अंतिम निवेदन होगा।

इन रचनाओं को भी पढ़ें-
लक्ष्य जीवन का
टूटता साथ
सच्ची लगन
फैसला
मंटो, सच आज भी वही है दोस्त…
मनवा खाए हिचकोले
इश्क नहीं… मगर कम भी नहीं
इच्छा और ईश्वर का संघर्ष
अनाम बंधन
मौन था वह
इन्सानियत
लक्ष्य जीवन का
टूटता साथ

One thought on “अनाम बंधन

  1. बहुत सुंदर सृजन 👌

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *