रात भर एक करवट है माँ

रात में माँ की तस्वीर के पास बैठा भावुक व्यक्ति, यादों में खोया हुआ शांत और उदास दृश्य।

विजया डालमिया, हैदराबाद

कितने ही बीते लम्हे आँखों में आँसू बनकर बिखर गए, जब पिछले साल की यादों का कारवाँ मेरे दिल से गुजरने लगा। साल भर पहले जहाँ रौनक और जिंदगी झूम रही थी, वहीं आज कभी न खत्म होने वाली मायूसी छाई हुई है। सच है, कुछ लोगों के रहने से ही घर और चेहरों पर रौनक रहती है।

पिछली बार हम सब मम्मी के साथ कितने खुश थे। हम सबने कितना एंजॉय किया। पर शायद वह हमारी जिंदगी का दिल से किया गया आख़िरी एंजॉय था। वह नाचना-गाना, झूमना, धूम मचाना. सब कुछ कितना अच्छा था, कितना सच्चा था। पर बस वही पल यादगार बनकर रह गए। भूलना चाहें तो भी नहीं भूल सकते।

किसे पता था कि मम्मी जिंदगी में पहली और आख़िरी बार एक साथ झंडा फहरा रही हैं। हम कुछ भी कैद कर सकते हैं—खुशी का जज़्बा या पीड़ा का एहसास। खुशी तो आज कहीं भी महसूस होती ही नहीं। हाँ, एहसासों को दरकिनार कर दिया जाए, तो पत्थरों के भीतर भी कभी-कभी दरिया निकल आता है।

एहसास… अनुभूति उस स्पर्श की, उनके मुस्कुराते लबों की, उनके खिलते चेहरे की बार-बार हो रही है। यहीं कहीं तो हैं—हर पल में, हर याद में। फिर भी दिल बहलता नहीं। दिल को तो गवाह चाहिए। तस्वीरों से भी भला दिल बहला है कभी? वह तो और बिखर ही जाता है। बगावत कर बैठता है कि गुज़रे दिन फिर से लौट आएँ। पागल दिल जानता ही नहीं कि जो बीत गया, वह बीत गया। तारीखें लौटती हैं, पर समय और वे पल कभी लौटकर नहीं आते।

मम्मी के बिना हर दिन रहना होगा—इसकी मानसिक तैयारी कभी नहीं थी। अपने जन्मदिन पर सबसे ज्यादा हम उसी के अंश होते हैं, जिसकी याद सबसे अधिक आती है। और जननी हमेशा दुआओं के रूप में, आशीर्वाद बरसाते हुए, हमारे आसपास ही रहती है।

इन सर्द हवाओं में महसूस करोगे, तो पा ही जाओगे उसकी ममता की गर्माहट। फूलों की खुशबू में पा जाओगे उसके प्यार की महक। मंदिर की घंटी में सुन लोगे उसकी आवाज़ की खनक। रसोई के मसालों में मिल जाएगी उसके हाथों की लचक। चाँद-तारों की जगमगाहट में पा जाओगे उसकी दुआओं की चमक।

कहाँ नहीं है वह? नहीं होते हुए भी तो हर जगह है।

हम सब अकेले-अकेले सिसक रहे हैं, क्योंकि हम नहीं चाहते किसी और को इसमें शामिल करना। फिर भी कहते हैं न, जिस तरह खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं, उसी तरह दुख बाँटने से घटता है। हँसने से मन का आसमान खुल जाता है और रोने से मन का आँगन धुल जाता है।

तो क्यों न आज हम एक छोटी-सी कोशिश करें जिन्हें हम नहीं भूल सकते, उन्हें हर पल याद तो करेंगे ही; क्योंकि जिसे भूल जाएँ, उसे याद नहीं कहते, और याद को भुला देना नामुमकिन होता है। पर रोकर नहीं, हँसकर याद करेंगे।

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7 thoughts on “रात भर एक करवट है माँ

  1. निशब्द हूँ माँ मात्र शब्द नहीं अपितु अनुभूति है उसका त्याग अतुलनीय है उसका प्रेम संपूर्णता है उसका आशीष जीवन है । अद्भुत अप्रतिम ।

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