बहती संवेदना

सावन की चूड़ियां: नवविधवा बहू और बड़की काकी

शर्मिला चौहान, ठाणे (महाराष्ट्र)

सावन का सूरज बदलियों के साथ लुका-छिपी में लगा है। त्यौहारों की शुरुआत को अपनी रंग-बिरंगी, नमूनेदार चूड़ियों और कंगनों से चमकदार बनाने के लिए बड़की काकी अपनी नवविधवा बहू रूपल को साथ लिए गली-गली घूम रही है।सड़क किनारे नीम के नीचे टोकरी रख, दोनों ने अपनी चूड़ियों का गुणगान शुरू किया। बदलियों के पाश से छूटी चंद किरणें टोकरी में भरी रंग-बिरंगी चूड़ियों को स्पर्श करने लगीं।
श्वेत किरणों ने मानो लाल, पीले, हरे, गुलाबी रंगों से श्रृंगार कर लिया।बड़की काकी अपनी पच्चीस साल पुरानी, श्वेत-धूसर रंग की साड़ी और हाथों में पीतल-तांबे के कड़े पहने बहू रूपल को देखने लगी। एक साल में वह कितनी सूख गई है। एक लंबी सांस लेकर बड़की फिर आवाज़ लगाने लगी।

इस गाँव की गलियों की औरतों को पिछले पच्चीस साल से चूड़ियों से सजाने वाली बड़की काकी का अनुभव सही था। दो घंटे में ही चूड़ियाँ टोकरी से निकलकर स्त्रियों की कलाइयों में इठलाने लगीं।सास की तरह सधे हुए अंदाज में रूपल भी कठोर-कोमल हथेलियों से छोटी-छोटी चूड़ियाँ चढ़ा रही थी। अपनी सूनी, धातु से जकड़ी कलाइयों पर रंग-बिरंगी चूड़ियों का स्पर्श उसकी आँखों में अनोखी चमक पैदा कर देता।

पिछले साल जवान बेटे की असमय मौत परिवार पर गाज बनकर गिरी थी। घर की दीवार जैसे ढह गई हो बड़की के पति इस हादसे को नहीं झेल पाए, वे भी भरभरा गए।नींव अपने काम पर लगी रही और साथ में इस नई ईंट को भी थाम लिया।“माई, सारी चूड़ियाँ बिक गईं आज। बस ये दो दर्जन गुलाबी रह गई हैं। ये भी बिक जाएँ तो टोकरी खाली हो जाएगी,” रूपयों को गिनते हुए रूपल ने सास से कहा।
श्रृंगार-विहीन जवान बहू की गुलाबी रंग में डूबी आँखों से एक अनुभवी औरत की नजरें मिलीं। कुछ क्षणों बाद रूपल की कलाइयों में गुलाबी रंग उतर आया।घर वापसी के समय अब सिर्फ टोकरी खाली थी।

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लेखिका के बारे में


शर्मिला चौहान
समकालीन हिंदी साहित्य की एक सशक्त और बहुआयामी लेखिका हैं, जो लघुकथा, कहानी, कविता, हास्य-व्यंग्य और संस्मरण जैसी विभिन्न विधाओं में समान दक्षता से लेखन कर रही हैं। महाराष्ट्र के ठाणे में निवासरत शर्मिला जी ने अपनी सूक्ष्म संवेदनाओं, सहज भाषा और जीवन के यथार्थ से जुड़ी कथाओं के माध्यम से पाठकों के मन में एक विशिष्ट स्थान बनाया है।एम.एच.एससी. एवं बी.एड. की शैक्षणिक पृष्ठभूमि से समृद्ध, उनका लेखन सामाजिक सरोकारों, मानवीय रिश्तों और बदलते परिवेश की गहरी समझ को प्रतिबिंबित करता है। उनकी प्रमुख कृतियों में “मुट्ठी भर क्षितिज”, “रोशनी की अमरबेल”, “सोंधी महक” तथा “काके लागूँ पाय” शामिल हैं, जिन्हें पाठकों और समीक्षकों से व्यापक सराहना प्राप्त हुई है।देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और ई-पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ, लघुकथाएँ और व्यंग्य रचनाएँ निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। उनके साहित्यिक योगदान को अनेक राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों और सम्मानों से भी गौरवान्वित किया गया है, जिनमें विभिन्न अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं में प्राप्त प्रथम, द्वितीय एवं विशेष पुरस्कार प्रमुख हैं।शर्मिला चौहान का लेखन जीवन की सादगी में छिपी गहराइयों को उजागर करता है और पाठकों को संवेदना, चिंतन और आत्ममंथन की एक सशक्त यात्रा पर ले जाता है।

12 thoughts on “बहती संवेदना

  1. छोटे कस्बे में रहनेवाली अनपढ़ साधारण महिलाओं की मानवी संवेदना को बहुत प्रभावी ढंग से परिभाषित किया गया है इस लघु कथा में।
    लेखिका ने जितना लिखा है उससे कहीं ज़्यादा कहा है, जो उनकी सशक्त लेखनी का परिचय देती हैं।
    उसके लिए बहुत बहुत साधुवाद और बधाई।

  2. Bahot sunder lagukatha likhe ho sharmila☺️ naari sakti ka ek aur najariya badala hai aap ne is lagukatha ke jariye 👏 hume garv hai ke hume aapke sabhi kahaniyo ko padne ka moka milta hai 🙏

  3. एक सधी हुई, संवेदनशील कहानी है जो बहुत कम शब्दों में दुख, परंपरा, ममता और पुनर्जीवन की बात कह देती है।

  4. बहुत मार्मिक,सुंदर लघुकथा। भावनाओ,संवेदनाओं को गहराई से महसूस करने की और समझने क्षमता और सजगता दिखाती है।

  5. शर्मिला आज तक आपने लिखी हुई सभी कथाएं man को छू जाती है इस तरह यह लघु कथाएं भी बहुत ही सुंदर भावपूर्ण शब्दों में लिखी गई है , आपका लिखने की शैली ही
    ऐसी है की मां को भा जाती है

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