
डॉ. अनामिका दुबे “निधि” मुंबई
वो कहते हैं तेरी तस्वीर से नज़र हटती नहीं मेरी,
वो बात और है, जब फ़ुर्सत में हो तो याद आती है मेरी।
तुम्हारी आँख में जो ख़्वाब थे, सब देखे हमने,
मगर ताबीर की हर शाम में क्यों कमी रह जाती है मेरी।
लबों पर नाम मेरा है ये दावा भी किया तुमने,
मगर महफ़िल में अक्सर ख़ामोशी ही गवाही देती है मेरी।
मोहब्बत को खिलौना समझकर खेलते हो तुम,
दिल की बिसात पर हर चाल मगर भारी पड़ जाती है मेरी।
तुम्हारी राह में रौशन दिए हम ही ने रखे थे,
अँधेरों में मगर पहचान ही धुंधली हो जाती है मेरी।
वो कहते हैं तेरी तस्वीर से नज़र हटती नहीं मेरी,
मगर सच ये है हर तस्वीर में तन्हाई नज़र आती है मेरी।
ये मोहब्बत भी अजीब दस्तूर रखती है,
जिसे चाहो वही अक्सर कसक बन याद आती है मेरी।
‘निधि’, तेरी सादगी पर वो मरते हैं ये कहते तो हैं,
मगर दुनिया के डर से बात अधूरी रह जाती है मेरी।

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