
डॉ. अनामिका दुबे ‘निधि’, मुंबई
सबसे खूबसूरत आलिंगन मौत सिखाएगी,
रोते-बिलखते दुनिया विदा करेगी,
मौत तो मुस्कुराकर गले लगाएगी।
ज़िन्दगी ने हर मोड़ पर शर्तें रखीं,
कभी सपनों से, कभी अपनों से जंग कराई,
जहाँ चाहा ठहरना, वहाँ चलना पड़ा,
जहाँ चुप रहना था, वहीं आवाज़ उठाई।
कभी रिश्तों के नाम पर बोझ दिए गए,
कभी ज़िम्मेदारियों में साँसें उलझीं,
हर सुबह एक नया इम्तिहान लेकर आई,
हर रात अधूरी नींद में ढल गई।
ज़िन्दगी ने सिखाया हँसते रहो,
चोट कितनी भी गहरी हो, छुपा लो,
अपने आँसुओं को खुद ही पोंछो,
और गिरकर भी संभलना सीख जाओ।
मगर मौत…
ना सवाल पूछेगी, ना जवाब चाहेगी,
ना सही-गलत का हिसाब मांगेगी,
ना किसी भूमिका में बाँधेगी।
वो कहेगी—थक गए हो तो आ जाओ,
अब किसी को साबित कुछ नहीं करना,
अब कोई उम्मीद ढोने की ज़रूरत नहीं,
बस थोड़ी सी ख़ामोशी ओढ़ कर सो जाना।
जहाँ न कोई कमी गिनेगा,
न कोई तुलना होगी,
जहाँ “काफी नहीं” कहने वाली दुनिया
अचानक बहुत दूर होगी।
मौत का आलिंगन
डर नहीं होगा,
वो एक ठहराव होगा
लंबी भागदौड़ के बाद
मिले हुए सुकून जैसा।
शायद इसीलिए
ज़िन्दगी जितनी कठिन लगती है,
मौत उतनी ही सरल प्रतीत होती है
क्योंकि वहाँ
खुद होने की इजाज़त
आख़िरी बार नहीं,
पहली बार मिलती है।
लेखिका के बारे में-
डॉ. अनामिका दुबे “निधि”
हिंदी प्रवक्ता के रूप में 4 वर्ष तथा अध्यापिका के रूप में 2 वर्ष कार्यरत रहीं। वे “राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच” की संस्थापिका हैं और विभिन्न मंचों व FM पर काव्य पाठ कर चुकी हैं। उनकी रचनाएँ दैनिक भास्कर सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उन्हें वाचस्पति मानद, कलम रत्न, साहित्य संगिनी, अजातशत्रु और साहित्य प्रभा जैसे कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। उनकी एकल पुस्तक “मेरी भावनाएं” प्रकाशित है और वे 100+ साझा काव्य संकलनों में योगदान दे चुकी हैं।
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