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इब्तिदा-ए-इश्क

“शाम के धुंधले माहौल में अकेला शख्स इश्क़ के ख्यालों में डूबा हुआ” “इश्क़- जहाँ अधूरापन भी मुकम्मल एहसास बन जाता है”

रश्मि मृदुलिका, देहरादून ( उत्तराखंड )

इब्तिदा-ए-इश्क का एक छोर तेरे पास छोड़ आए हैं,
इस तरह गुंजाइश अभी तक बाकी रख आए हैं।

शायद मुकम्मल हो जाए एक कहानी अनकही,
इश्क़-ए-दस्तूर निभाने को वजूद रख आए हैं।

उजाले चुभने लगे हैं आँखों में काँच बनकर,
एक शाम उधारी की दिन से माँग लाए हैं।

श्रृंगार नहीं भाता, अब सादगी से निखरने लगे हैं,
एक तेरे इश्क़ की चाँदी कंगन में पहन आए हैं।

थाम लिए हैं रास्ते, दिल—मुसाफ़िर रुक गए हैं,
चलते-चलते दो कदम, रास्ते पहचान आए हैं।

थक गए ता-उम्र परवाज़ भरते-भरते परिंदे,
पंखों को समेट कर, ज़मीं पर उतर आए हैं।

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