इब्तिदा-ए-इश्क
इश्क़ एक ऐसा एहसास है जो शब्दों से परे होते हुए भी कविता में सबसे खूबसूरत ढंग से व्यक्त होता है। “इब्तिदा-ए-इश्क” इसी एहसास की एक झलक है, जहाँ अधूरापन भी एक मुकम्मल कहानी का हिस्सा बन जाता है।

इश्क़ एक ऐसा एहसास है जो शब्दों से परे होते हुए भी कविता में सबसे खूबसूरत ढंग से व्यक्त होता है। “इब्तिदा-ए-इश्क” इसी एहसास की एक झलक है, जहाँ अधूरापन भी एक मुकम्मल कहानी का हिस्सा बन जाता है।
वह ख्यालों में बार-बार आता रहा कभी याद बनकर सुलाता, कभी कसक बनकर रुलाता। कभी ज़ख़्मों पर मरहम था, तो कभी दिल की आग। साँसों में उसकी महक थी, बारिश की तरह वह बरसता रहा। जब दिल के दरवाज़े खुले, तो वही धड़कन बनकर बस गया। समय बेरहम था, इश्क़ पर परदा रहा और मैं, हर टूटन के बाद भी उसी को महसूस करती रही।