
डॉ. अनामिका दुबे निधि, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
तन थके तो वैद्य मिले…
मन थके तो कौन…?
घाव दिखें तो मरहम मिल जाए,
अदृश्य पीर का कौन…?
तन के ज्वर को औषधि मिलती,
मन की ज्वाला दाह…
भीतर-भीतर राख हो जाए,
बिन बरसे ही चाह…
तन रोए तो लोग पूछते
“क्या हुआ है भला?”
मन रोए तो हँसकर कह दे
“कुछ भी नहीं… चला…”
तन थके तो विश्राम मिले,
नींद की कोमल गोद…
मन थके तो ढूँढ़े अपना
एक सच्चा संयोग…
शायद मन का वैद्य वही है,
जो सुन ले हर बात,
बिन टोके… बिन तौले…
दे दे बस एहसास का साथ।
तन थके तो वैद्य मिले…
मन थके तो
“अपना” मिले… तो बात बने।
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