मुझसे मेरा मन बंजारा
माटी से माटी के नाते पर सवाल उठाता मन, पथराई आँखों में छिपी पीड़ा और भीतर सुलगते अहसासों को यह कविता संवेदनशील शब्दों में व्यक्त करती है.

माटी से माटी के नाते पर सवाल उठाता मन, पथराई आँखों में छिपी पीड़ा और भीतर सुलगते अहसासों को यह कविता संवेदनशील शब्दों में व्यक्त करती है.
मन की थकान वह पीड़ा है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता। “मन थके तो कौन?” कविता इसी अदृश्य दर्द को उजागर करती है, जहाँ तन की बीमारी का इलाज तो मिल जाता है, लेकिन मन के घाव केवल एक सच्चे अपने की उपस्थिति से ही भरते हैं। यह कविता हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी सबसे बड़ा सहारा सिर्फ सुनने वाला एक दिल होता है।