
मौसमी चंद्रा, प्रसिद्ध लेखिका एवं वाइस आर्टिस्ट
“तुम सिर्फ मेरी दोस्त हो! इससे अधिक नहीं! तुम भी मुझे यहीं समझती हो न!”
लड़के ने सहजता से अपनी बात रखी और एक प्रश्न छोड़ दिया।
प्रतिउत्तर में लड़की ने सिर्फ हां में सिर हिला दिया।
कुछ दिन गुमसुम से बीते!
लड़का पहले की तरह दिनभर की बातें उसे बताता और लड़की अपनी बड़ी बड़ी आँखें उसपर टिकाए सब सुनती रहती। कभी कभी लड़के को एकटक देखते हुए उसकी बड़ी बड़ी आँखें तरल हो जाती फिर एक मुस्कान सारी तरलता कंठ में उड़ेल लेती ।
दिन बीतते गए…
एक शाम लड़की ने बहुत धीमे से कहा था-
“कभी-कभी खो जाना चाहिए…जो ढूँढने आएगा, वास्तविकता में वही अपना होता है।”
उसने उसकी बात को हमेशा की तरह एक मज़ाक समझा और हवा में उड़ा दिया।
फिर एक रोज लड़की अचानक से लापता हो गई!
न कॉल, न मैसेज, न कोई चुप इशारा!
सड़क के मोड़ पर जिस रोज ये आखिरी मुलाकात हुई थी
वहाँ सिर्फ हवा बची थी और लड़के के भीतर एक बेचैनी!
दो- तीन दिन यूं ही गुजरे! फिर दिन जैसे तैसे बीतने लगा।
उसकी हँसी, उसकी बातों की धीमी खनक,यहाँ तक कि मैसेज पर उसका “हम्म” कहना भी!
वो अपने आसपास देखता और हैरत में पड़ जाता! दुनिया के बाकी लोग कैसे अपनी उसी दिनचर्या में खोए हैं यंत्रचालित से! कोई अचानक से गायब हो गया और किसी को फर्क नहीं पड़ता!
क्या इमोशनल अटैचमेंट नाम की कोई चीज बाकी नहीं बची! वो चाहता था कोई आए और पूछे वो किधर गई? क्यों नहीं दिखती इन दिनों? सब ठीक तो है न!
पर अफसोस कोई नहीं आया!
खैर…दुनिया की क्यों सोचे जब वो भी उसे सिर्फ मिस कर रहा है! मां कहती थी आग होनी चाहिए किसी भी चीज को पाने की!
पाने की न सही,ढूंढने की आग उसमें है और वो उसे ढूंढकर ही रहेगा! दुनिया इतनी भी बड़ी नहीं कि खोए हुए लोग ढूंढे न जा सके!
पर लड़की वाकई गायब हो गई थी कोई पता नहीं!
इस तरह अचानक! कहां गई !
उसे नदियां बहुत पसंद थी, कभी लड़की ने ही बातों बातों में लड़के को बताया था…
वो कहा करती थी, नदी और किनारे घने प्रेम के प्रतीक हैं लेकिन मुझे नदियों में सबसे ज्यादा रेवा नदी भाती है।
प्रेम में धोखा खाने के बाद भी उसने किसी और को नहीं चुना। संसार के बनाए विवाह के नियम को त्यागकर उल्टी दिशा में बहना स्वीकार किया!
जीवन में अगर कभी मैं याद आऊं तो रेवा के तट पर आ जाना!
आज लड़का खड़ा था उसी नदी के तट पर! ढलता सूरज और चांद के आने की आहट!
एक पत्थर पर पानी में अपने दोनों पांव डाले वो बैठी दिखाई दी। गुलाबी शॉल जो हर सर्दियों में उसके कांधे लग जाती, उसे ही ओढ़े…
“मैं अपनी शॉल भूल गया! क्या आधी दोगी ओढ़ने को? ठंड लग रही!”
लड़की ने मुड़कर देखा! बड़ी बड़ी आँखें आज फिर तरल हो गई!
ह्म्म्म!
कहते हुए लड़की ने अपनी आधी शॉल उसके इर्द गिर्द लपेट दी!
छोटे से पत्थर पर दो लोग घुमड़ कर बैठ गए थे!
कभी-कभी अनजाने लोग सबसे ज्यादा जगह घेर लेते हैं…
सही है न…प्रेम में सब शेयर कर लेना चाहिए! जगह भी,शॉल भी और एकांत भी…

प्यारी रचना 👌
वाह ! हमेशा की तरह शानदार रचना 👌 शुभकामनाएं !