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मिलना उसे जो ढूंढने आएगा

एक अधूरी-सी दोस्ती, अनकहे जज़्बात और अचानक हुई गुमशुदगी…खोजते-खोजते वह वहीं पहुँचा जहाँ कभी उसने कहा था “याद आऊँ तो रेवा के तट पर आ जाना।” ढलते सूरज, ठंडी हवा और आधी शॉल में समा जाने वाली इस मुलाक़ात में प्रेम ने चुपचाप अपनी जगह फिर से पा ली।

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10 रुपये की कीमत

आज़ादी के बाद के दिनों में दो घनिष्ठ मित्र थे .एक धनी, एक साधारण।
एक दिन निर्धन मित्र ने 10 रुपये उधार लिए और फिर अचानक परिवार सहित कहीं चला गया।
25 साल बाद लखनऊ के एक होटल में दोनों अचानक मिले वही साधारण मित्र अब होटल मालिक बन चुका था।उसने कहा “मैं वो 10 रुपये वापस नहीं दूँगा, क्योंकि उन्हीं 10 रुपयों ने मुझे आज ये पहचान दी है।”

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