
निर्मला शर्मा, लेखिका, आरा (बिहार)
प्रेम का पहला एहसास
मैंने देखा था
उसकी आँखों में
जहाँ
यौन की गहराई नहीं,
एक अपार अपनापन तैरता था।
मैंने देखा था
अपना सब कुछ
धीरे-धीरे खोते हुए,
और महसूस किया था
कि वह भी
अपने हिस्से की दुनिया
कहीं पीछे छोड़ रही थी।
बिछड़ते वक़्त
उसके मायूस चेहरे पर
दर्द की धुंध थी,
पर होंठों पर
एक दृढ़ “निश्चय”
काँपता हुआ चमक रहा था।
और मैं
उदासी से भारी मन लिए
फिर भी
एक अनकहा
“विश्वास” सँभाले खड़ा था…
कि प्रेम
कभी पूरी तरह टूटता नहीं,
वह बस
रूप बदलकर
दिल में रह जाता है।
