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एक विरह ऐसा भी…

वियोग के उस क्षण में कवि को उसकी आँखों में प्रेम और आत्मीयता दोनों दिखाई देते हैं। बिछड़ते समय दोनों ने कुछ न कुछ खोया था. एक ने उदासी को सहा, दूसरे ने निश्चय को अपने होंठों पर थामे रखा। इस टूटते हुए रिश्ते के बीच भी कवि के भीतर एक मौन विश्वास जन्म लेता है कि प्रेम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

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आँखों में दर्द और मुस्कान लिए खड़ी लड़की, प्रेम और बिछड़ाव का पल

प्रेम का एहसास

प्रेम का पहला धुँधलका मैंने उसकी आँखों में देखा था वहाँ कोई असहज चाह नहीं, बल्कि एक ऐसी कोमलता थी जिसमें मेरा अस्तित्व अनायास घुलने लगता था। उस क्षण में प्रेम और देह, दोनों किसी पवित्र स्वीकृति की तरह एक-दूसरे में समा रहे थे।
मैंने महसूस किया था कि कुछ खोने की प्रक्रिया हम दोनों के भीतर एक साथ चल रही है अपने-अपने विश्वास, अपनी सुरक्षा, अपनी आदतें… मानो प्रेम हमें भीतर से उधेड़कर, नए रूप में बुन रहा हो।

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