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स्त्री है त्रिशक्ति

स्त्री है त्रिशक्ति,
शारदा, शिवा और श्री।
पीपल की ठंडी छाँव,
सावन की झड़ी।

ठिठुरती ठंड में,
धूप गुनगुनी।
आदि है सृष्टि की,
अंत भी वही।

धरती-सी क्षमाशील,
रौद्र रूप काली भी।
तुलसी आँगन में खड़ी।

दोनों हाथों से दे देती है,
पुजारिन बस प्रेम की।
कोख में समा लेती,
दुनिया छोटी-सी।

पालती है दूध से,
खून से सींचती।
दया की भिक्षुक नहीं,
चाहिए पूजा भी नहीं।

थोड़ी-सी इज्ज़त,
बहुत सारा प्यार—
इतने से भर जाता है,
इसका अपना संसार।

प्रीति प्रधान, लेखिका, भिलाई

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