तन्हाई: भीड़ में खोई आत्मा

तन्हाई…

यह कविता “तन्हाई” इंसान के उस दर्द को उजागर करती है, जब वह भीड़ में रहकर भी खुद को अकेला महसूस करता है। इसमें जीवन के संघर्ष, टूटे सपनों और भावनात्मक खालीपन को बेहद संवेदनशील शब्दों में व्यक्त किया गया है।

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ख्यालों में आता रहा…

वह ख्यालों में बार-बार आता रहा कभी याद बनकर सुलाता, कभी कसक बनकर रुलाता। कभी ज़ख़्मों पर मरहम था, तो कभी दिल की आग। साँसों में उसकी महक थी, बारिश की तरह वह बरसता रहा। जब दिल के दरवाज़े खुले, तो वही धड़कन बनकर बस गया। समय बेरहम था, इश्क़ पर परदा रहा और मैं, हर टूटन के बाद भी उसी को महसूस करती रही।

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एक कतरा प्यार

वह मुझसे नहीं, मेरे वजूद के सिर्फ एक छोटे से अंश से प्यार कर बैठा। उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं कि मेरे बाकी हिस्सों में कितनी कहानियाँ, कितने घाव और कितनी चुप्पियाँ दबी पड़ी हैं। मेरी हँसी के पीछे छुपे आँसू, मेरे सुकून के पीछे की बेचैनी, और मेरी तन्हाइयों के पीछे की चीखें ये सब उसकी समझ से बहुत दूर हैं।

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इंतज़ार

ज़िंदगी ने बस इतना ही सिखाया है कि इंतज़ार भी एक उम्र माँगता है। न जाने कितनी रातें, कितने दिन तेरी याद में गुज़र गए। खामोशी बहुत कुछ कहती है, पर जब दिल नहीं समझ पाता, मैं फ़िज़ाओं के बीच आकर तेरे दीदार की आस लगा बैठता हूँ। अब तो ये हवाएँ भी थकी-सी लगती हैं .मानो ये भी चाहती थीं कि एक दिन मेरी खामोशी मुस्कान में बदल जाए।

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ऑनलाइन की हरी बत्ती..

हर रात एक ही इंतज़ार स्क्रीन पर उसका ऑनलाइन दिखना। बातों में कुछ ख़ास नहीं, पर उस हरी बत्ती के पीछे जैसे एक रिश्ता साँस लेता है। उसकी हर “गुड मॉर्निंग” कमरे की ख़ामोशी में रोशनी भर देती है, और मैं फिर अगले इंतज़ार में डूब जाता हूँ।

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महकते ख़्वाबों की रात

घर मेरा किसी अनजानी ख़ुशबू से महकने लगा था। जाने क्यों, हर कोने में उसकी आहट गूंजने लगी। फ़िज़ाओं में कोई चाप नहीं थी, फिर भी सन्नाटा जैसे टूटने लगा। मैंने तो किवाड़ बंद रखे थे, पर लगता है कोई ख़्वाब दरवाज़ा खटखटा गया। रातें अब पहले जैसी तन्हा नहीं रहीं — एक उम्मीद थी कि शायद दूरी मिटेगी, और इसी ख़याल से दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। जब आखिर मैंने दरवाज़ा खोला, तो हवाओं के साथ आए अरमानों का दीया बुझ गया — जैसे किसी अधूरी मुलाक़ात ने अपनी कहानी वहीं ख़त्म कर दी हो।

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क्या करूँ

उस रात देर तक खिड़की के पास बैठी रही। सामने मेज़ पर रखा एक ख़त बार-बार उसकी नज़र खींचता, पर वह उसे खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। बाहर चाँदनी का उजाला कमरे में फैल गया था — उतना ही शांत और अकेला, जितना उसका मन। आईने में बार-बार खुद को निहारते हुए उसे महसूस हुआ कि वह सिर्फ़ अपने आप से बातें कर रही है। वह सोचती रही — जब मिलने नहीं आते, तो इस फ़ुर्सत का क्या करे? जब बिछड़ने का डर हर पल सताता है, तो इस दहशत का क्या करे? शायद यही मोहब्बत की लत है, जो छोड़ने से भी नहीं छूटती। और आखिर में, जब दोस्त कहते हैं “सब्र रख, गायत्री”, तो वह बस मुस्कुरा देती है — क्योंकि सब्र भी अब उसी की तरह थक चुका है।

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चाय की ख़ुशबू और यादों की परतें

चाय की ख़ुशबू संग जब यादों की परतें खुलती हैं,
तो ज़िंदगी में खोया-पाया सब सामने आ खड़ा होता है।दिल अक्सर सोचता है — काश! जो चाहा था, वही मिल जाता… या ज़िंदगी एक और मौका देती।”

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