खण्डहरों में घर बसाना ही तो ज़िंदगी है….

ज़िंदगी सिर्फ आसान रास्तों का नाम नहीं है। असली ज़िंदगी तो तब शुरू होती है जब इंसान खंडहरों में भी एक घर बसाने का हौसला रखता है। जब आंसुओं के बीच भी मुस्कुराना न छोड़े, और जब नामुमकिन लगने वाले हालातों को मुमकिन बना देने का साहस दिखाए। मौसम बदलते रहेंगे, कभी उजाले होंगे तो कभी शामें भी उतरेंगी। लेकिन जो इंसान मुश्किलों से डरे नहीं, उन्हें अपना गुरु माने, वही बुलंदियों को छू पाता है। अंधेरे आते हैं, अमावस भी होती है, पर उसी के बीच से चांदनी भी निकलती है — जो इस सच्चाई को समझ ले, वही सच्चे अर्थों में जीना जानता है।

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श्याम रंग में भीग चला मन

इस कविता में रचनाकार भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपने गहरे प्रेम और आध्यात्मिक लगाव को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करता है। वह पाठक को कृष्ण के धाम की ओर जाने का निमंत्रण देता है — उस पावन भूमि की ओर, जहाँ संध्या होते ही गोपियाँ नृत्य करती हैं और हर दिशा भक्ति-रस में भीग जाती है। श्रीकृष्ण की एक झलक पाकर ऐसा अनुभव होता है मानो मृत्यु भी अब भयावह नहीं, बल्कि सुखद और शांति देने वाली हो गई हो। यह भाव उस आत्मिक स्थिति का संकेत है जहाँ ईश्वर-दर्शन के बाद जीवन-मरण का बंधन अर्थहीन प्रतीत होने लगता है। रचनाकार के लिए कृष्ण केवल एक देवता नहीं, बल्कि प्रेम और सत्य के प्रतीक हैं। उनके भीतर एक ईश्वरीय आभा और तेज है, जो उन्हें औरों से अलग बनाता है, यहाँ तक कि राम से भी। यह तुलना विरोध नहीं, बल्कि भावों की भिन्नता को दर्शाती है — राम मर्यादा के प्रतिनिधि हैं, तो कृष्ण प्रेम के।

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आज ही सुना जाए

“हर दिन एक नई शुरुआत लेकर आता है, और आज का दिन भी कुछ सवालों, कुछ संभावनाओं के साथ हमारे सामने खड़ा है। बीते कल की उलझनों और आने वाले कल की चिंता में उलझे रहना स्वाभाविक है, लेकिन यदि हम ठान लें कि ‘आज’ को ही जिएंगे, तो वही सबसे बड़ा समाधान होगा। यह कविता हमें प्रेरित करती है कि हम बीते कल की चिंताओं और भविष्य की अनिश्चितताओं को छोड़कर, आज की चुनौतियों को आज ही हल करें और जीवन में नवीनता लाएं। ‘आज ही कल के कर्म को क्रम से लिया जाए’—यह संदेश हर उस व्यक्ति के लिए है जो आत्मनिर्भरता और वर्तमान में जीने की भावना को अपनाना चाहता है।”

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वह बहक गई थी…

“महान बनने की चाहत में वह बहक गई थी, लेकिन इस युग में महानता नहीं, इंसान को पढ़ने की आवश्यकता है। न कोई विद्यालय, न परीक्षा, केवल परिणाम — जो या तो हानि देगा या लाभ। संवेदनशीलता की अति पागलपन की ओर ले जाती है, जहाँ न कोई पहचान होती है, न कोई अस्तित्व, बस एक मानसिक रोगी का दर्जा। यही है महान बनने की प्रक्रिया का असली संघर्ष।”

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“रिश्तों की श्वास: विश्वास”

जिस प्रकार जीवन के लिए श्वास लेना आवश्यक है, उसी प्रकार रिश्तों को जीवित रखने के लिए विश्वास की आवश्यकता होती है। यदि रिश्तों में शक, झूठ और अवसाद जैसी अशुद्ध वायु भर जाए, तो उनका दम घुटने लगता है। ऐसे में जरूरी है कि हम स्वयं सकारात्मक रहें और अपने रिश्तों को विश्वास की स्वच्छ हवा प्रदान करें, क्योंकि इन्हें बचाने की ज़िम्मेदारी हमारी ही है – किसी और की नहीं।

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वापसी के रास्ते….

“जब हम इश्क़ की राह पर चलते हैं, तो सब कुछ नया, ताज़ा और सुंदर लगता है। लेकिन वही राह जब लौटने की बनती है, तो हर पेड़, हर हवा, हर मोड़ अजनबी सा लगता है। इश्क़ के रास्ते पर हम खुद को कहीं पीछे छोड़ आते हैं… और वापसी की राह असल में उसी खोए हुए ‘ख़ुद’ की तलाश बन जाती है।”

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जीवन एक- वचन नहीं है

जीवन एक-वचन नहीं है। यह दो पत्थरों के रगड़ से जन्मी आग की तरह है—जहाँ दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे को प्रकाशित करता है। यह टकराहट नहीं, रचना है। हम सबके अनुभव अलग हैं, फिर भी जुड़ाव की ज़रूरत अपरिहार्य है। पर आज, हम सिर्फ़ व्यूज में हैं, अंतर्बोध में नहीं। जो घटित हो रहा है, वह केवल घटना नहीं, संवेदना है—लेकिन हम ठहरते नहीं, स्क्रॉल करते जाते हैं।

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…अगर ज़िंदगी फिर से मुड़ जाए

इस कविता में एक स्त्री अपने जीवन के उस मोड़ पर खड़ी होकर गुज़रे समय को फिर से जीने की ख्वाहिश करती है — वो अधूरे सपने, वो रिश्ते, वो बचपन की अलमारी, और माँ की बातें… सब कुछ एक बार फिर सहेजने की उम्मीद लिए। यह एक आत्ममंथन है, एक नई शुरुआत की ओर बढ़ने का भावुक आह्वान।”

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