Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
अपनी बेटी का हाथ थामे आत्मविश्वास से आगे बढ़ती माँ, नए शहर की पृष्ठभूमि में उगता सूरज

मुक्ति की उड़ान…

“मुक्ति की उड़ान” एक सशक्त कहानी है जो दर्शाती है कि जब एक माँ अपने आत्मसम्मान और बेटी के भविष्य के लिए खड़ी होती है, तो वह समाज की हर रूढ़ि को तोड़ सकती है। यह कहानी नारी साहस, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की प्रेरक मिसाल है।

Read More

…खटकने लगोगे

यह रचना उस क्षण की सच्चाई बयान करती है जब व्यक्ति दूसरों की अपेक्षाओं से बाहर निकलकर अपनी राह चुनता है। जैसे ही कोई अपने सपनों, अपनी आवाज़ और अपने आत्मसम्मान के लिए खड़ा होता है, वही समाज उसे चुभने वाला मानने लगता है। लेख जीवन की कमान अपने हाथ में रखने और स्वार्थी दुनिया की पहचान करने की सशक्त सीख देता है।

Read More
महिला की गरिमा और मानसिक पीड़ा को दर्शाती सशक्त कविता, जिसमें बिना शारीरिक स्पर्श के की गई हिंसक दृष्टि और नजरों के अपराध को शब्दों के माध्यम से उजागर किया गया है.

देह नहीं, आत्मा का अपमान

यह कविता एक स्त्री के उस अनुभव को गद्यात्मक रूप में सामने रखती है, जहां शारीरिक छेड़छाड़ के बिना भी उसकी गरिमा पर हमला किया जाता है. यह रचना बताती है कि किसी की घूरती, गंदी नजरें भी हिंसा का ही रूप होती हैं, जो मन को भीतर तक घायल कर देती हैं. कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल स्पर्श से नहीं, बल्कि दृष्टि और मानसिक उत्पीड़न से भी होता है, और ऐसी हर सोच व व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.

Read More

सीमाओं के भीतर उड़ान

वह किसी पोस्टर पर छपी निडर स्त्री नहीं थी. न ही हर बहस में आगे बढ़कर अपनी ताक़त साबित करने वाली कोई प्रतीकात्मक नायिका. अनन्या उन अनगिनत महिलाओं में से एक थी, जिनकी शक्ति शोर नहीं करतीवह संतुलन रचती है.

Read More

 सोच बदल गई

कभी-कभी हमारी भलाई की सोच भी सामने वाले के लिए बोझ बन जाती है. नीलम ने यह समझा कि उपहार की कीमत से ज़्यादा उसकी गरिमा और अपनापन मायने रखता है. सीमा के एक सधे हुए उत्तर ने नीलम की सोच बदल दी और यह सिखा दिया कि उपहार महँगा नहीं, बल्कि नया और सम्मानजनक होना चाहिए.

Read More

काँच नहीं, अब धार हूँ

कभी किसी दिन जीवन की भाग-दौड़ से पल चुराकर मैं अपनी ही बनाई शांति में बैठूँगी। फूलों, पेड़ों और परिंदों की चहचहाहट के बीच मैं खुद को सुनूँगी और तब समझ आएगा कि सबसे बड़ा सहारा मैं स्वयं रही हूँ। टूटकर भी जिसने खुद को समेटा, वही मेरी असली पहचान है।

Read More

अगर मैं किसी सुबह न उठूँ…

जिस सुबह वह नहीं उठी, वह हार नहीं थी वह एक चुप विदाई थी।रोज़ के झगड़ों, टूटती उम्मीदों और खुद को खो देने की थकान का अंत। जिसे वह प्रेम समझती रही, वह पत्थर निकला, और जिसे वह बचाती रही, वही उसे तोड़ता रहा।

Read More

बाबूजी की हाथ घड़ी

मेरे पिताजी एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक थे, जिनकी तनख्वाह कम थी, लेकिन आत्मसम्मान और ज्ञान कूट-कूट कर भरा था। साल 1974 में उनके तबादले के समय, घर का सारा खर्च उधारी पर चलता था। घर का सामान बैलगाड़ी में शिफ्ट करना था, लेकिन पिताजी ने सबसे पहले 60 रुपए का उधार चुकाया। इसके लिए उन्होंने अपनी प्रिय सुनहरे डायल वाली हैनरी सैंडो घड़ी बेच दी।

Read More