सीमाओं के भीतर उड़ान
वह किसी पोस्टर पर छपी निडर स्त्री नहीं थी. न ही हर बहस में आगे बढ़कर अपनी ताक़त साबित करने वाली कोई प्रतीकात्मक नायिका. अनन्या उन अनगिनत महिलाओं में से एक थी, जिनकी शक्ति शोर नहीं करतीवह संतुलन रचती है.

वह किसी पोस्टर पर छपी निडर स्त्री नहीं थी. न ही हर बहस में आगे बढ़कर अपनी ताक़त साबित करने वाली कोई प्रतीकात्मक नायिका. अनन्या उन अनगिनत महिलाओं में से एक थी, जिनकी शक्ति शोर नहीं करतीवह संतुलन रचती है.
कभी-कभी हमारी भलाई की सोच भी सामने वाले के लिए बोझ बन जाती है. नीलम ने यह समझा कि उपहार की कीमत से ज़्यादा उसकी गरिमा और अपनापन मायने रखता है. सीमा के एक सधे हुए उत्तर ने नीलम की सोच बदल दी और यह सिखा दिया कि उपहार महँगा नहीं, बल्कि नया और सम्मानजनक होना चाहिए.
सीमा ने जीवन भर सबके लिए जीते हुए यह सीखा कि माँ होना त्याग है, लेकिन आत्मसम्मान छोड़ देना किसी भी रिश्ते की अनिवार्यता नहीं है।
कभी किसी दिन जीवन की भाग-दौड़ से पल चुराकर मैं अपनी ही बनाई शांति में बैठूँगी। फूलों, पेड़ों और परिंदों की चहचहाहट के बीच मैं खुद को सुनूँगी और तब समझ आएगा कि सबसे बड़ा सहारा मैं स्वयं रही हूँ। टूटकर भी जिसने खुद को समेटा, वही मेरी असली पहचान है।
जिस सुबह वह नहीं उठी, वह हार नहीं थी वह एक चुप विदाई थी।रोज़ के झगड़ों, टूटती उम्मीदों और खुद को खो देने की थकान का अंत। जिसे वह प्रेम समझती रही, वह पत्थर निकला, और जिसे वह बचाती रही, वही उसे तोड़ता रहा।
मेरे पिताजी एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक थे, जिनकी तनख्वाह कम थी, लेकिन आत्मसम्मान और ज्ञान कूट-कूट कर भरा था। साल 1974 में उनके तबादले के समय, घर का सारा खर्च उधारी पर चलता था। घर का सामान बैलगाड़ी में शिफ्ट करना था, लेकिन पिताजी ने सबसे पहले 60 रुपए का उधार चुकाया। इसके लिए उन्होंने अपनी प्रिय सुनहरे डायल वाली हैनरी सैंडो घड़ी बेच दी।
किसी एक स्त्री ने कभी अपने ऊपर सारी ज़िम्मेदारियाँ लाद ली होंगी प्रेम और सम्मान की आशा में। तभी तो पीढ़ियाँ गुज़र गईं, पर “ना” कहने की हिम्मत आज भी उसके भीतर कहीं दबी रह गई। उसने जो बोझ उठाया, वही बोझ उसने अपनी बेटी को भी सौंप दिया.यह कहकर कि “मैंने किया है, तुम भी करना।”
शायद अगर कभी उसने एक बार कह दिया होत “यह सिर्फ मेरा काम नहीं है, हम मिलकर बाँटेंगे”तो आज घरों में ज़िम्मेदारियाँ बराबर होतीं, और स्त्री सिर्फ कर्तव्य नहीं, अपना अधिकार भी जी रही होती।
ह की देहरी लांघकर तुम कभी मुझ तक नहीं आ पाओगे। मैं केवल बाहर से दिखाई देने वाला शरीर नहीं हूँ, मैं सिर से पाँव तक, बाहर से भीतर तक सम्पूर्ण हृदयवत हूँ। इस शरीर के खोल की दीवारें मैंने कछुए जैसी मजबूत बनाई हैं। यह बदन भोग्य नहीं, यह एक मंदिर है, जिसमें मैंने स्वयं की प्रतिमा स्थापित की है और उस द्वार की प्रहरी मैं स्वयं हूँ।
कहानी राधिया नाम की झुग्गी बस्ती में रहने वाली एक स्त्री की है, जो एक समाजसेवी “मैडम जी” से मिलकर नई उम्मीदों से भर जाती है। उसे लगता है कि अब उसका जीवन बदल जाएगा . उसे नौकरी मिलेगी, सम्मान मिलेगा, और अपने बच्चों को शिक्षित कर सकेगी। पर जब वह काम के लिए मैडम जी के घर पहुँचती है, तो देखती है कि वही “मैडम जी” अपने पति के अत्याचार का शिकार हैं। यह दृश्य राधिया की सारी कल्पनाओं को तोड़ देता है। उसे एहसास होता है कि औरत चाहे अमीर हो या गरीब, उसके दर्द और संघर्ष एक जैसे हैं।
मैं नारी हूं। गलतियां करती हूं, पर उन्हें दोहराती नहीं। गलती से सबक लेकर आगे बढ़ना जानती हूं। सीमाओं में रहकर भी सफलता को गले लगाना चाहती हूं। अपनी लक्ष्मण रेखा स्वयं तय करती हूं, जिसे कोई लांघकर अंदर नहीं आ सकता और कोई बहरूपिया मुझे रेखा पार ले जा नहीं सकता। मैं उन्नति के शिखर को छूना चाहती हूं, पर अपने दायरों में रहकर। किसी को कुचलकर आगे बढ़ना या किसी समझौते के कारण झुकना नहीं चाहती। सफलता न मिले तो भी मंज़ूर है, लेकिन अपने किरदार को गिराना नहीं चाहती। अगर मेरे परिवार को बुरी नज़रें छू जाएं, तो काली दुर्गा बनने में मुझे देर नहीं लगती। ज़रूरत पड़े तो कंधे से कंधा मिलाने में कभी नहीं कतराती। मुझे बराबरी का दर्जा मिले या न मिले, पर मेरी शान इससे कभी घटती नहीं।