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स्त्री का मौन बोझ

किसी एक स्त्री ने कभी अपने ऊपर सारी ज़िम्मेदारियाँ लाद ली होंगी प्रेम और सम्मान की आशा में। तभी तो पीढ़ियाँ गुज़र गईं, पर “ना” कहने की हिम्मत आज भी उसके भीतर कहीं दबी रह गई। उसने जो बोझ उठाया, वही बोझ उसने अपनी बेटी को भी सौंप दिया.यह कहकर कि “मैंने किया है, तुम भी करना।”
शायद अगर कभी उसने एक बार कह दिया होत “यह सिर्फ मेरा काम नहीं है, हम मिलकर बाँटेंगे”तो आज घरों में ज़िम्मेदारियाँ बराबर होतीं, और स्त्री सिर्फ कर्तव्य नहीं, अपना अधिकार भी जी रही होती।

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देह की देहरी से परे

ह की देहरी लांघकर तुम कभी मुझ तक नहीं आ पाओगे। मैं केवल बाहर से दिखाई देने वाला शरीर नहीं हूँ, मैं सिर से पाँव तक, बाहर से भीतर तक सम्पूर्ण हृदयवत हूँ। इस शरीर के खोल की दीवारें मैंने कछुए जैसी मजबूत बनाई हैं। यह बदन भोग्य नहीं, यह एक मंदिर है, जिसमें मैंने स्वयं की प्रतिमा स्थापित की है और उस द्वार की प्रहरी मैं स्वयं हूँ।

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औकात

कहानी राधिया नाम की झुग्गी बस्ती में रहने वाली एक स्त्री की है, जो एक समाजसेवी “मैडम जी” से मिलकर नई उम्मीदों से भर जाती है। उसे लगता है कि अब उसका जीवन बदल जाएगा . उसे नौकरी मिलेगी, सम्मान मिलेगा, और अपने बच्चों को शिक्षित कर सकेगी। पर जब वह काम के लिए मैडम जी के घर पहुँचती है, तो देखती है कि वही “मैडम जी” अपने पति के अत्याचार का शिकार हैं। यह दृश्य राधिया की सारी कल्पनाओं को तोड़ देता है। उसे एहसास होता है कि औरत चाहे अमीर हो या गरीब, उसके दर्द और संघर्ष एक जैसे हैं।

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ना झुकती, ना रुकती — मैं नारी हूं

मैं नारी हूं। गलतियां करती हूं, पर उन्हें दोहराती नहीं। गलती से सबक लेकर आगे बढ़ना जानती हूं। सीमाओं में रहकर भी सफलता को गले लगाना चाहती हूं। अपनी लक्ष्मण रेखा स्वयं तय करती हूं, जिसे कोई लांघकर अंदर नहीं आ सकता और कोई बहरूपिया मुझे रेखा पार ले जा नहीं सकता। मैं उन्नति के शिखर को छूना चाहती हूं, पर अपने दायरों में रहकर। किसी को कुचलकर आगे बढ़ना या किसी समझौते के कारण झुकना नहीं चाहती। सफलता न मिले तो भी मंज़ूर है, लेकिन अपने किरदार को गिराना नहीं चाहती। अगर मेरे परिवार को बुरी नज़रें छू जाएं, तो काली दुर्गा बनने में मुझे देर नहीं लगती। ज़रूरत पड़े तो कंधे से कंधा मिलाने में कभी नहीं कतराती। मुझे बराबरी का दर्जा मिले या न मिले, पर मेरी शान इससे कभी घटती नहीं।

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प्रेम का वादा, पीड़ा का सच

नारी का हृदय प्रेम में जितना कोमल होता है, पीड़ा में उतना ही कठोर अनुभवों से गुजरता है। प्रेम से पीड़ा तक का यह सफ़र उसकी संवेदनाओं को भीतर तक झकझोर देता है। धोखा, अपमान और परित्याग उसके आत्म-सम्मान को धज्जी-धज्जी कर देते हैं, कभी-कभी तो उसे जीवन-लीला समाप्त करने की कगार पर पहुँचा देते हैं।

फिर भी वही नारी आँसुओं में भी शक्ति ढूँढ़ लेती है। टूटकर भी वह बिखरती नहीं, बल्कि खुद को गढ़ लेती है—अपनी प्रतिमा, जिसमें प्राण फूँकने के लिए किसी और की आवश्यकता नहीं। यही उसका आत्मविश्वास है, यही उसकी सच्ची शक्ति।

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ना रोक खुद को अब…

हर कठिनाई से लड़ने की ताकत रखती है तू, तो फिर सुन स्त्री, अब अपने स्त्री होने पर शर्म नहीं, गर्व किया कर। जहाँ मन लगे, वहाँ दिल लगाना तेरा अधिकार है, और आईने में मुस्कुराकर खुद को पहचानना भी। तू सिर्फ जिम्मेदारियों में नहीं, हक़ में भी जी सकती है – खुद से प्यार कर, खुद को सजा, और दुनिया को दिखा कि तू क्या है।”

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एक प्याली चाय… और पीछे छुपा पूरा असम

“भारत की आत्मा अगर विविधता है, तो उसकी सांसों में जो सुगंध बसी है वह है चाय की खुशबू। हर सुबह की शुरुआत, हर शाम की थकान, दोस्तों की हंसी और दफ्तर की भागदौड़—इन सबके बीच कहीं न कहीं असम की मिट्टी और मेहनत की खुशबू घुली होती है। असम की ब्रह्मपुत्र घाटी की उर्वर मिट्टी और मेहनती मजदूरों की तपस्या से निकली हर चाय की चुस्की सिर्फ स्वाद नहीं, एक संस्कृति, संघर्ष और सम्मान की दास्तान सुनाती है।”

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खुद से प्यार: एक छोटी शुरुआत, एक बड़ी मुस्कान

हम अक्सर दूसरों को खुश करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि खुद से प्यार करना भूल जाते हैं। लेकिन असली सुकून तब मिलता है जब हम खुद को अपना फेवरेट बना लेते हैं। खुद से बात करना, अपने साथ समय बिताना, और खुद को समझना – यही तो है सच्चा प्यार। क्योंकि जब आप खुद से प्यार करेंगे, तभी दुनिया भी आपको उसी नजर से देखेगी।

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जो टूटी नहीं.. वो राशि थी

राशि अब भी रोज़ लड़ती है—कभी खुद से, कभी हालातों से, और कभी रिश्तों की खामोश दीवारों से। पर अब उसकी लड़ाई किसी को मनाने की नहीं, खुद को साबित करने की भी नहीं… अब उसकी लड़ाई खुद को खोने से बचाने की है।

उस दिन जब वो मंच पर खड़ी थी, साड़ी के पल्लू में कॉर्पोरेट पहचान और आंखों में एक मां की नमी समेटे—तब शायद पहली बार उसने खुद को पूरा महसूस किया।

जिसने कभी सपने पूरे करने के लिए किसी का सहारा नहीं माँगा, आज वो अपने संघर्ष की इमारत में अपनी बेटी के लिए खिड़कियाँ बना रही थी—जहाँ से आर्या रोशनी देख सके, आज़ादी की हवा महसूस कर सके। राशि जान चुकी थी—”परफेक्ट” दिखना ज़रूरी नहीं, खुद को समझना, स्वीकारना और थामे रखना उससे कहीं ज़्यादा बड़ा काम होता है।

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