रंगों को मलाल है..
होली के रंग खुशियों के प्रतीक माने जाते हैं, लेकिन कभी-कभी ये रंग विरह की पीड़ा भी बयान कर देते हैं। यह कविता प्रेम, दूरी और यादों के भाव को रंगों के प्रतीक के माध्यम से व्यक्त करती है जहां रंग भी जैसे पूछते हैं, साथ क्यों नहीं।

होली के रंग खुशियों के प्रतीक माने जाते हैं, लेकिन कभी-कभी ये रंग विरह की पीड़ा भी बयान कर देते हैं। यह कविता प्रेम, दूरी और यादों के भाव को रंगों के प्रतीक के माध्यम से व्यक्त करती है जहां रंग भी जैसे पूछते हैं, साथ क्यों नहीं।
“प्रभु का प्रसाद” एक सुंदर भक्ति कविता है जिसमें ईश्वर से आशीर्वाद, प्रेम, सुख और मंगल विचारों की कामना की गई है। यह रचना मानव जीवन में भक्ति, करुणा और सकारात्मकता का संदेश देती है।
“पिताजी को कैसे मनाना है” एक भावपूर्ण हिंदी कविता है, जिसमें दोस्तों के साथ समय बिताने की इच्छा और पिता से अनुमति लेने की मासूम दुविधा को सरल और हृदयस्पर्शी शब्दों में व्यक्त किया गया है।
“मैं लिखने बैठी हूँ” एक भावनात्मक हिंदी कविता है जिसमें कवयित्री अपने मन में उमड़ते विचारों, जीवन के अनुभवों, प्रेम, प्रकृति और स्मृतियों को शब्दों में व्यक्त करती है। यह कविता आत्मा की आवाज़ और संवेदनाओं की गहराई को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती है।
“नारी दिवस की ज़रूरत नहीं” एक संवेदनशील हिंदी कविता है जो बताती है कि स्त्री को एक दिन के उत्सव से ज्यादा रोज़ मिलने वाले सम्मान, स्नेह और समझ की आवश्यकता है। छोटे-छोटे भावनात्मक क्षण ही असली महिला सशक्तिकरण का आधार हैं।
“नारी कमजोर नहीं” एक प्रभावशाली हिंदी कविता है जो स्त्री की शक्ति, आत्मसम्मान और साहस को उजागर करती है। यह कविता समाज को चेतावनी देती है कि नारी को कमज़ोर समझना सबसे बड़ी भूल है और सम्मान ही उसके अस्तित्व का आधार है।
यह प्रेरक महिला दिवस कविता बताती है कि असली सशक्तिकरण बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि विचारों, आत्मविश्वास और संवेदनशीलता में है। जब स्त्री अपनी पहचान खुद तय करने लगे और जीवन को संभावनाओं के विस्तार की तरह जीने लगे, तभी महिला दिवस सार्थक होता है।
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद रंग ज़िंदगी को खूबसूरत बनाते हैं।जीवन में हर रंग अपनी अहमियत दर्ज कराने समय-समय पर चला आता है। अमूमन हम नीले, पीले, हरे और सबसे पुराने रंगगुलाबी के बारे में जानते हैं। रंग ज़िंदगी में हों या शब्दों में… वे खुद को बयां कर ही देते हैं। आइए जानते हैं,…
यह कविता एक ऐसी स्त्री की आवाज़ है जो हर जगह मौजूद होते हुए भी कहीं दर्ज नहीं थी। यह उसकी पहचान, उसकी अनसुनी चीख और उसके जीवित रहने के अधिकार की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
यह कविता होली के रंगों में डूबी प्रेम और प्रतीक्षा की कथा कहती है। फागुन की पुरवाई, लाल-गुलाबी रंग और प्रियतम की स्मृतियाँ सब मिलकर विरह को और भी मधुर बना देते हैं। यह रचना उत्सव के बीच छुपी प्रेम की तड़प को खूबसूरती से अभिव्यक्त करती है।