प्रेम का संगम

यह कविता गहरे प्रेम और स्मृतियों की शक्ति को दर्शाती है। कवयित्री अपने प्रिय के अस्तित्व को अपनी स्मृतियों और प्रार्थनाओं में जीवित रखती है। उसका प्रेम इतना निष्ठावान है कि उसने किसी उद्देश्य या लक्ष्य की अपेक्षा नहीं की, केवल यह सुनिश्चित किया कि वह अपने प्रिय की खुशी और अस्तित्व का सम्मान करती रहे। कवयित्री अपने प्रेम को एक फल या कर्म के रूप में समर्पित करती है और इसे ईश्वर के माध्यम से पवित्र बनाती है।

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मां की आराधना में नारी

यह कविता नारी के महत्व, उसकी शक्ति और समाज में उसके सम्मान की आवश्यकता पर केंद्रित है। लाल चुनरी से सजा माँ का दरबार और नौ दिन की पूजा नारी की भक्ति और महिमा को दर्शाते हैं। कविता यह बताती है कि सृष्टि नारी के बिना नहीं चलती और जहाँ नारी का अपमान होता है, वहाँ पूजा-पाठ व्यर्थ है। विता में यह संदेश भी है कि नारी को कभी कमजोर नहीं बनना चाहिए। यदि उसके आत्म-सम्मान पर चोट पहुँचती है, तो उसे काली या चंडी के रूप में दुष्टों का विनाश करना चाहिए। साथ ही यह भी उजागर किया गया है कि आज भी कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियाँ जारी हैं और बेटियों की सुरक्षा समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर, यह कविता नारी सम्मान, शक्ति, साहस और जागरूकता का संदेश देती है।

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मां आदिशक्ति

यह कविता मां भवानी की आराधना और शक्ति की महिमा का उत्सव है। कवि मां को आदिशक्ति के रूप में पूजता है और उनके चरणों में शरण पाने की इच्छा व्यक्त करता है। कविता में यह दर्शाया गया है कि श्रद्धा और भक्ति से मां सभी संकटों को दूर करती हैं और जीवन में मंगल लाती हैं।
कन्या रूप में विराजित शक्ति, उनके चरणों से सुख-शांति और सामर्थ्य प्रदान करती है। दुर्गा अष्टमी जैसे पर्वों के माध्यम से मां का आशीर्वाद प्राप्त करने का महत्व भी उजागर किया गया है। कुल मिलाकर, यह कविता भक्ति, शक्ति, संरक्षण और आशीर्वाद का संदेश देती है।

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विरह की चुप्पी…

विरह की चुप्पी केवल एक स्त्री की कहानी नहीं है, बल्कि जीवन की गहराई का रूपक है। ऊँचे टीले पर बैठी नायिका सादगी और मासूमियत की प्रतिमा है—उसकी आँखों में टूटी हुई आकांक्षाएँ और मौन में दबे सपने हैं। उसके पास खड़ा सूखा वृक्ष, जैसे उसके मन के उजड़े आँगन का साक्षी हो। और उसी वृक्ष की डाली पर बैठी अकेली चिड़िया, उसकी पीड़ा को गीत में बदल देती है।

पवन उससे प्रश्न करता है—“किसका नाम लिए खोई हो?” लेकिन उत्तर शब्दों में नहीं, आँसुओं में टपकता है। यह मौन, यह अधूरापन, उसी विरह का संगीत है।फिर भी यह कविता केवल दुख का चित्र नहीं है। चिड़िया की तान हमें बताती है कि हर पतझड़ के पीछे छुपी होती है नयी हरियाली, हर सूखेपन के पार होती है नवजीवन की आहट।

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तन भादों, मन सावन

प्रेम में भीगकर तन-मन तरबतर हो जाता है। प्रिय की पनीली निगाहें जब देखती हैं तो भीतर जल-प्लावन-सा उमड़ पड़ता है। बहकी-बहकी हवाएँ चलती हैं तो तन और मन दोनों ही भाव-विभोर हो जाते हैं। मिलन और बिछोह का अनुभव मानो झूलों के आवागमन जैसा प्रतीत होता है। प्रिय के बदन को छूकर गुजरती हवाओं में सागर-सा लावण्य घुल जाता है। जब से वह मन के द्वार पर आया है, तन-मन उसका घर-आँगन बन गया है। अंतरतम में उसके बस जाने से तन मंदिर और मन पावन हो गया है।

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पट समय के खोलने दो

कविता की हर पंक्ति भीतर से निकलती हुई आत्मा की पुकार थी। उसने खुद को दीप की तरह जलने दिया, ताकि उसकी रौशनी चारों ओर फैले। कैद की दीवारें अब उसे रोक नहीं सकती थीं; हँसने, बहने और खुलकर जीने का समय आ गया था।

भीतर की नदी को जब उसने खोल दिया, तो उसके किनारे टूट गए और जहाँ भी पड़ी, जीवन भीग गया। भूले हुए राग अब ताल में लौट आए, खलिश की पुरानी यादें गीत बनकर बह गईं। जीवन के फीके रंग अब नए सपनों के रंग में घुलने लगे। हवाओं की घुटन और रात की निशा भी खुल गई; समय के पट अब खुल चुके थे।

यह कविता एक स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति की कहानी थी—जहाँ भीतर की ऊर्जा और रचनात्मकता खुलकर बहती है, और आत्मा को अपनी पूरी क्षमता के साथ जीने का अवसर मिलता है।

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जरा जरा तू हमसे मिल कविता

जरा-ज़रा तू हमसे मिल

जरा जरा तू हमसे मिल, तनिक तनिक उतर मेरे दिल…” यह कविता प्रेम के उन कोमल एहसासों को छूती है, जहाँ शब्द कम और नजरों की भाषा ज़्यादा बोलती है। मिलन की चाह, दिल की तड़प और अनकहे जज़्बातों को बेहद खूबसूरती से पिरोती यह रचना पाठक के मन में एक मधुर रोमांटिक लहर जगा देती है।

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खरगोश-सा नाज़ुक दिल

एक स्त्री थी, जिसका दिल खरगोश-सा नाज़ुक था। वह चाहती थी कि जीवन हँसी और प्रेम की बारिश से भीगे, पर उसकी भावनाओं को कभी महत्वपूर्ण नहीं समझा गया। ओस से भीगी घास को छूकर मुस्कराने की उसकी चाहत, दूसरों की कठोरता में दबकर रह गई। स्थूल प्रेम की निरंतर चोटों ने उसे भीतर से घायल कर दिया।

फिर एक दिन पछुआ हवा चली, बादल घिर आए और घनघोर वर्षा होने लगी। उस वर्षा में भीगते हुए उसने पहली बार अपने भीतर-बाहर बादलों का स्पर्श महसूस किया। हवा की अनंत यात्रा आकर उसकी छाती पर ठहर गई, और उसके भीतर का नाज़ुक दिल धड़कता रहा। जीवन के बेस्वाद गिलास में अचानक प्रेम का रंग घुलने लगा।

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हिन्दी से है पहचान

सुमन दीक्षित, प्रसिद्ध लेखिका, कोलकाता अभिव्यक्ति किसी भी जीव की,ख़ासकर मानवीय संवेदनाओं का,सशक्त माध्यम परिलक्षित होती है—वह हो चाहे किसी भी रूप में…! अगर भाषा की बात आती,तो सम्मान हर भाषा का है;पर हिन्दी तो मेरे लिए जैसेईश्वर का एक वरदान है…! हिन्दी से है पहचान, क्षमता,गौरव भरा होता सदा सृजन।हिन्दी से जुड़ी है आत्मा…

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हिन्दी से है मेरी पहचान

यह कविता हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और गर्व को उजागर करती है। हिंदी केवल हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, ज्ञान और संस्कारों का प्रतीक भी है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि हिंदी हमारे जीवन, साहित्य और राष्ट्र की आत्मा का अभिन्न हिस्सा है।

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