ख़ामोश प्रेम-पत्र
शब्दों से परे प्रेम की एक कोमल अनुभूति “ख़ामोश प्रेम-पत्र” उस भावना को बयान करती है, जहाँ लिखना नहीं, महसूस करना ही प्रेम है।

शब्दों से परे प्रेम की एक कोमल अनुभूति “ख़ामोश प्रेम-पत्र” उस भावना को बयान करती है, जहाँ लिखना नहीं, महसूस करना ही प्रेम है।
“हम सपने देख रहे हैं” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो स्त्री के जीवन, त्याग, श्रम, घरेलू और सामाजिक संघर्ष को रोटी के प्रतीक के माध्यम से गहराई से अभिव्यक्त करती है।
“बदलता वक़्त” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो टूटते रिश्तों, बढ़ती हैवानियत, अख़बारी सुर्खियों की लाल स्याही और समाज में गिरती इंसानियत को संवेदनशील शब्दों में उजागर करती है।
इन आँखों में बसे असंख्य समंदर कभी हँसी बनकर छलकते हैं, तो कभी अचानक आँसुओं में बदल जाते हैं। जाल से डरती मछलियाँ अतल गहराइयों में खो जाती हैं, जहाँ बिछुड़ने का दुख भी उनके हिस्से आता है। बाज़ार की साज़िशों में उलझा शिकारी सिर्फ़ पकड़ने की भाषा समझता है उसे न जिजीविषा दिखती है, न जीवन की पीड़ा। रंग-बिरंगी मछलियाँ कुछ दिनों का मनोरंजन बनती हैं और फिर गंदे पानी में तड़पकर समर्पित हो जाती हैं। स्वच्छ पानी की अनदेखी में दम तोड़ती मछलियाँ याद दिलाती हैं कि जीवन तभी बचेगा, जब संवेदना बचेगी।
“ऋतु बसंत आयो री” प्रकृति के नवजीवन, प्रेम और उल्लास का काव्यात्मक उत्सव है। शीतल बयार, खिले सुमन, कोयल की कूक और मन के हिलोर के माध्यम से यह कविता बसंत ऋतु की जीवंत अनुभूति कराती है।
मैं कविता हूँ” केवल शब्दों की रचना नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों का स्वीकार है। दुख, सुख, प्रकृति और समय के बीच कविता स्वयं को खोजती और सदा जीवित रहती है।
“वे लौटेंगे” एक प्रभावशाली कविता है जो बिखरे हुए लोगों के फिर से संगठित होकर अन्याय के खिलाफ खड़े होने की उम्मीद को स्वर देती है। यह रचना संघर्ष, एकता और मानवता के बीज बोने की बात करती है। कविता बताती है कि जो लोग दिशाओं में बिखर गए हैं, वे एक दिन फिर लौटेंगे भूख, पीड़ा और अन्याय को मुट्ठी में भींचकर, एक स्वर और एक आवाज़ बनकर।
यह रचना प्रेम, स्मृति और इंतज़ार की मार्मिक कथा है। प्यार में पागल एक लड़की, जो समय के साथ आगे बढ़ गई है, लेकिन वादों की स्मृतियाँ आज भी बस स्टॉप पर खड़ी मिलती हैं। शीशा, काजल, मुस्कान और हर आती बस सब मिलकर अधूरे प्रेम और लौटकर न आने वाले वादे की एक संवेदनशील कविता रचते हैं।
यह कविता प्रेम, पहचान और आत्मिक संवाद की कोमल अभिव्यक्ति है। ‘अजनबी’ और ‘सांवरे’ के प्रतीकों के माध्यम से कवि मन की उस यात्रा को शब्द देता है, जहाँ नादानी, तलाश और समर्पण एक-दूसरे में घुल जाते हैं। प्रेम यहाँ केवल सांसारिक नहीं, बल्कि भक्ति और आत्मा का स्वर बन जाता है। मन की भटकन, चित की चोरी और ऋतु प्रीत की सुगंध के साथ यह रचना पाठक को भीतर तक छूती है और उसे अपने ही भावलोक में ले जाती है।
श्मशान की राख से लौटकर जब ज़िंदगी की जिम्मेदारियाँ बाँहों में भर ली जाती हैं—तब यह कविता मृत्यु से आँख मिलाकर जीवन को चुनने का साहस बन जाती है।