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साध्वी श्री शाश्वतप्रिया जी म.सा. का महिदपुर रोड में भव्य मंगल प्रवेश

साध्वी शाश्वतप्रिया म.सा. आदि ठाणा का भव्य मंगल प्रवेश

महिदपुर रोड में साध्वी श्री शाश्वतप्रिया जी म.सा. आदि ठाणा का भव्य मंगल प्रवेश। गुरुदेव जयघोष, धर्मसभा और रतलाम चातुर्मास निमंत्रण।

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संघर्ष और दृढ़ संकल्प से निखरती स्त्री को दर्शाती यथार्थवादी तस्वीर

सबसे खूबसूरत स्त्री

सबसे खूबसूरत स्त्री” एक सशक्त कविता है जो स्त्री के सौंदर्य को संघर्ष, दृढ़ संकल्प और अदम्य जिजीविषा के रूप में परिभाषित करती है। यह कविता स्त्री की मौन शक्ति और आत्मबल को स्वर देती है।

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अकेली वृद्ध माँ बैठी हुई, आँखों में आँसू और मन में पीड़ा, सामाजिक उपेक्षा का प्रतीक

क्यों वृद्धाश्रम में जाऊँ

यह कविता उस माँ की पीड़ा को स्वर देती है, जिसने जीवन भर अपनी संतान को सींचा, सँवारा और बड़ा किया, लेकिन अंत में उसी से वृद्धाश्रम जाने का आदेश मिला। यह रचना समाज से एक करुण सवाल पूछती है क्या माँ का अब कोई ठौर नहीं?

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शहर बनते गाँव का दृश्य, जहाँ पक्के मकानों के बीच अकेलापन और रिश्तों की दूरी दिखती है

मिट्टी की खुशबू रोती रही

यह कविता गाँव से शहर बने समाज की उस पीड़ा को उजागर करती है, जहाँ पक्के मकानों के बीच रिश्ते कच्चे होते चले गए। मिट्टी की खुशबू, चूल्हे का धुआँ और अपनापन सब कुछ शहरी भीड़ में कहीं खो सा गया है।

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रात के समय खिड़की के पास बैठा एक लेखक, कोरे काग़ज़ पर कलम से भावनाएँ लिखता हुआ

एहसासों का लावा…

लेखक केवल शब्द नहीं लिखता, वह अपने भीतर उमड़ते भावों को स्याही में घोलकर काग़ज़ पर उतारता है। कलम उसकी भावनाओं का वाहक बनती है और कोरा काग़ज़ अहसासों का सजीव संसार। यही लेखन श्रोताओं के दिल तक पहुँचकर अपनी अमिट छाप छोड़ देता है।

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सुबह की सुनहरी रोशनी में खेतों के बीच उगता सूरज और गोद में शिशु लिए माँ की छाया, धैर्य, संयम और आशा का प्रतीक

…बस धीरज का छोर न छूटे

बस धीरज का छोर न छूटे” एक सारगर्भित हिंदी कविता है जो धैर्य, सहनशीलता और अडिग विश्वास को जीवन का सबसे बड़ा बल बताती है। प्रकृति, मातृत्व, इतिहास और भक्ति के उदाहरणों के माध्यम से यह रचना बताती है कि समय चाहे कितना भी कठिन हो, धीरज ही सफलता और शांति की कुंजी है।

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सूरज रे तू बढ़ता चल

सूरज रे तू बढ़ता चल” एक प्रेरणादायक कविता है जो अंधकार, थकान और कठिन परिस्थितियों के बीच निरंतर आगे बढ़ते रहने का संदेश देती है। सूरज यहाँ केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि साहस, उम्मीद और उजाले का प्रतीक बनकर उभरता है।

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एक टूटा हुआ काँच का गिलास और खिड़की के पास उदास मुद्रा में बैठा व्यक्ति, जीवन और रिश्तों के टूटने का प्रतीक

टूटना

यह कविता ‘टूटना’ शब्द के बहाने जीवन की उन सभी चीज़ों को छूती है, जिनका टूटना केवल भौतिक नहीं बल्कि भावनात्मक और अस्तित्वगत पीड़ा भी बन जाता है। पेंसिल की नोक से लेकर रिश्तों और विश्वास तक हर टूटन एक गहरी चुप्पी छोड़ जाती है।

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लिखते हुए तुम

यह कविता लिखने की प्रक्रिया के भीतर छिपे प्रेम, एकाग्रता और भावनात्मक जुड़ाव को उकेरती है। प्रिय को लिखते हुए देखना, उसकी उँगलियों, कलम और भावनाओं को महसूस करना यह रचना शब्दों से पहले जन्म लेने वाले एहसासों की कथा है।

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