उपहार में शब्द
यह कविता उपहारों से परे शब्दों के स्नेह को महत्व देती है, जहाँ प्रेम फूलों या वस्तुओं में नहीं, बल्कि लिखी और पढ़ी गई कविताओं तथा किताबों के भावनात्मक स्पर्श में बसता है।

यह कविता उपहारों से परे शब्दों के स्नेह को महत्व देती है, जहाँ प्रेम फूलों या वस्तुओं में नहीं, बल्कि लिखी और पढ़ी गई कविताओं तथा किताबों के भावनात्मक स्पर्श में बसता है।
पोइसी टेल्स समूह द्वारा ११ जनवरी २०२६ को मुंबई के मुलुंड पश्चिम में आयोजित वार्षिक बहुभाषी काव्य गोष्ठी में देशभर से आए रचनाकारों ने हिंदी, मराठी और अंग्रेजी कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। नन्ही कवयित्री राम्या तिवारी की भावपूर्ण प्रस्तुति कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रही।
मोबाइल आज ज्ञान, संचार और सुविधा का माध्यम है, लेकिन अंधाधुंध उपयोग ने रिश्तों, बचपन और मूल्यों को संकट में डाल दिया है। चन्द्रवती दीक्षित की यह कविता तकनीक और विवेक के बीच
संतुलन की ज़रूरत को गहराई से उजागर करती है।
कुछ स्पर्श शरीर को नहीं, मन को छूते हैं। वे न वासना जगाते हैं, न भय बस भीतर कहीं भरोसे की लौ जला देते हैं। मर्यादा में बंधे ऐसे स्पर्श रिश्तों को शब्दों से पहले समझा देते हैं और इंसान को इंसान होने का एहसास कराते हैं।
ठंडी हवा ने जैसे पूरे शहर को अपनी गिरफ्त में ले लिया था. सुबह की धुंध गलियों में चुपचाप उतर आई थी और सूरज की किरणें मानो रास्ता तलाश रही थीं. लोग शॉल और स्वेटर में सिमटे, कदम धीरे-धीरे बढ़ा रहे थे. हर मोड़ पर चाय की भाप उठती दिखती थी, जो ठिठुरते बदन को थोड़ी राहत देती थी. कहीं बुजुर्ग आग के पास हाथ सेंकते नजर आते, तो कहीं बच्चे ठंड से सिकुड़ते हुए भी स्कूल की राह पकड़ते थे. यह सर्दी केवल मौसम नहीं थी, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की चाल को थाम लेने वाली एक खामोश ताकत बन चुकी थी.
जब शब्द हथियार बन जाएँ और फुसफुसाहटों में ज़हर घुलने लगे, तब एक स्त्री का सच बोलना केवल आत्मरक्षा नहीं रहता, वह समाज को आईना दिखाने का साहस बन जाता है। अपनी कहानी कहकर वह न सिर्फ़ स्वयं को मुक्त करती है, बल्कि उन अनकही चुप्पियों को भी तोड़ देती है, जिनमें अपराध पनपते हैं।
तुम्हारी लिखी हर पंक्ति ने मुझे भीतर तक छू लिया। तुम्हारे शब्दों में गंभीरता और स्त्री‑सम्मान की झलक थी। धीरे‑धीरे तुम्हारा व्यक्तित्व मेरे मन में उतर गया, और अब मुझे लगता है कि मैं तुम्हारी लेखनी की प्रेयसी बन चुकी हूँ। हर रोज़ तुम्हारा लिखा पढ़ना, मेरे लिए एक नयी दुनिया की खोज और प्रेम का अनुभव है।
सीमाओं पर खड़ा सैनिक सिर्फ़ बंदूक नहीं थामे होता, वह अपने घर, अपने बच्चों की हँसी और माता-पिता की आँखों की प्रतीक्षा भी वहीं छोड़ आता है। सर्दी, गर्मी और बरसात उसके लिए मौसम नहीं, कर्तव्य की परीक्षा होते हैं। देश की शान उसके कदमों में और भारत की नींद उसकी आँखों की जाग में सुरक्षित रहती है। यही कारण है कि हर दुआ, हर नमन और हर उम्मीद सबसे पहले उसी के नाम लिखी जाती है।
मुंबई प्रेस क्लब में आयोजित काव्य संग्रह ‘चितचोर’ के लोकार्पण अवसर पर साहित्यकारों ने कवयित्री पल्लवी रानी की कविताओं को भारतीय सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा बताया। डॉ. हरि जोशी ने उनकी रचनाओं में दिनकर और दुष्यंत कुमार की प्रतिध्वनि अनुभव करते हुए उन्हें भविष्य की सशक्त काव्य-सम्भावना बताया।
माँ कोई साधारण शब्द नहीं है। वह भाषा के नियमों से आगे जाकर संवेदना का रूप ले लेती है। उसे किसी संज्ञा, सर्वनाम या अलंकार में बाँधने की हर कोशिश अधूरी रह जाती है। माँ की ममता किसी कविता, किसी छंद या महाकाव्य की सीमा में नहीं समाती। वह एक ऐसा अनंत विस्तार है, जिसे समझने का प्रयास करते-करते शब्द स्वयं छोटे पड़ जाते हैं।