लफ़्ज़ों के तीर
दायरे सिमटते रहे और दूरियाँ बढ़ती रहीं।
हर रोज़ खुद को तराशते गए, फिर भी कमियाँ निकलती रहीं। उसके बदले हुए लहजे तीर बनकर लगे,और हम हर गिरावट के बाद हुनर से फिर सँभलते रहे।

दायरे सिमटते रहे और दूरियाँ बढ़ती रहीं।
हर रोज़ खुद को तराशते गए, फिर भी कमियाँ निकलती रहीं। उसके बदले हुए लहजे तीर बनकर लगे,और हम हर गिरावट के बाद हुनर से फिर सँभलते रहे।
डॉ. तारा गुप्ता द्वारा लिखित गज़ल संग्रह मुझ में भी रहता है इकतारा दिल और दिमाग के बीच बहते उस पुल की तरह है, जिस पर चलते हुए पाठक जीवन, संवेदना, अनुभव और दर्शन सभी को साथ लेकर आगे बढ़ता है. कुल 70 ग़ज़लें, 36 मुक्तक और 35 दोहे इस संग्रह को विविधता से भरते हैं और पाठक को एकरसता से दूर रखते हैं.
ज़िंदगी में तलाश रास्तों की नहीं, मंज़िल की होती है। इंसान कभी-कभी जीवन की भीड़ में इतना आगे बढ़ जाता है कि खुद से ही दूर हो जाता है। सुख चैन नहीं लेने देता और दुख नींद छीन लेता है, पर हम मुस्कुराते हुए सब झेलते हैं जैसे बेफ़िक्री में गुज़र रही ज़िंदगी को बस देखते जा रहे हों। असल खोज जीवनभर खुद को पाने की ही रहती है।
लाल बिंदी की ममता हो या आसमां का नीला सुकून — हर रंग जीवन को एक नई दिशा देता है। हर रंग अपनी कहानी कहता है, और इन्हीं रंगों से जीवन सच में पूर्ण बनता है।”
रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर आज अमर और सुहानी ने एक क़ैफे में मिलने का तय किया था…अमर आज किसी कारण से सुहानी के शहर आया हुआ था.अमर और सुहानी पहली बार मिलने वाले थे…..अमर ने सुहानी से कई बार मिलने की रिक्वेस्ट की थी. शायद वैसे ही कह दिया करता था, क्योंकि वो भी…
मुझे किसी अनदेखे से प्यार है ऐसा प्यार जो किसी चेहरे, आवाज़ या उपस्थिति का मोहताज नहीं. वह बस मेरी कल्पना में बसा है, मेरी सोच में साँस लेता है. लोग कहते हैं, यह पागलपन है, पर अगर दिल को सुकून मिलता है तो इसे क्या नाम दूँ? एक बार किसी को दिल में जगह दे दी, तो वही मेरा सच बन गया. मुझे झूठ से हमेशा ऩफरत रही है, इसलिए यह एहसास भी पूरी सच्चाई से भरा है. मुझे जीवन के फूल ही नहीं, उसके काँटे भी प्रिय हैं क्योंकि दर्द भी तो किसी गहराई से आता है. मुझे उन खिड़कियों से प्यार है, जहाँ से मैं दुनिया को देखती हूँ वही खिड़कियाँ शायद उस अनदेखे तक पहुँचने का रास्ता हैं.
प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण की सुंदर अभिव्यक्ति है। इसमें कवि ने पेड़ लगाने के आनंद और उससे जुड़ी संवेदनाओं को सहज बालसुलभ भाव में प्रस्तुत किया है। कविता यह संदेश देती है कि पेड़ केवल फल या छाया ही नहीं देते, बल्कि वे मनुष्य और जीव-जंतुओं — सबके जीवन का आधार हैं। दादी के स्नेहिल शब्दों से लेकर झूले पर झूलने की कल्पना तक, हर पंक्ति में प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध झलकता है। यह रचना बच्चों में पेड़ों के प्रति प्रेम, जिम्मेदारी और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जगाने वाली है।
यह कविता मन की उस द्वंद्व यात्रा को बयाँ करती है जहाँ सपनों की उड़ान और समाज के बंधन आमने-सामने खड़े हैं। कवि कहता है — मन को बाँध कर रखो, क्योंकि उसकी उड़ानें सुविधाओं और परिस्थितियों की सीमाओं से टकराती हैं।
यह रचना उस गहराई को छूती है जहाँ स्वतंत्रता की चाह और जिम्मेदारियों की जकड़न एक साथ सांस लेती हैं।
जहां शायरों ने, कवियों ने, औरत की सुंदरता के लिए अनेकों उपमानों का प्रयोग किया है, जैसे झील सी गहरी आंखें, हिरण सी सुंदर आंखें, सुराही दार गर्दन, मोरनी सी चाल, वहीं एक प्रेमी, अपनी प्रेमिका की बिंदी पर मर मिटा है,और वह चाहता है कि चाहे वह और कोई श्रृंगार करें या ना करें ,सिर्फ एक छोटी सी बिंदी वह अपने माथे पर लगा ले, और उसे किसी भी उपमान की जरूरत नहीं होगी।
*“असुंदर है”* समाज के विकृत चेहरों को उजागर करने वाली रचना है। कवि ने इस कविता में बार-बार “असुंदर है” कहकर हमारे भीतर और हमारे समाज में फैली उन कुरूप सच्चाइयों की ओर ध्यान दिलाया है, जिन्हें हम सामान्य मानकर अनदेखा करते रहते हैं।
कवि कहता है कि असुंदर है जब मनुष्य, मनुष्य के साथ भेदभाव करता है — किसी को महान और किसी को तुच्छ समझता है। यह असुंदर है जब पुरुष को मोक्ष का अधिकारी माना जाता है और स्त्री को पैरों की जूती समझा जाता है। असुंदर है जब पत्थरों को ईश्वर कहा जाता है, लेकिन मनुष्यों के साथ पशुओं जैसा व्यवहार किया जाता है।
गाँव के बीच मंदिर बनाना और कुछ लोगों को गाँव के बाहर बसाना भी असुंदर है। पत्थरों की पूजा करते हुए उन्हीं पर पशुओं की बलि चढ़ाना और जाति-धर्म के नाम पर लोगों को बाँटकर आपस में लड़ाना भी असुंदर है।