…बस धीरज का छोर न छूटे

सुबह की सुनहरी रोशनी में खेतों के बीच उगता सूरज और गोद में शिशु लिए माँ की छाया, धैर्य, संयम और आशा का प्रतीक

चन्द्रवती दीक्षित, करनाल (हरियाणा)

ईश्वर प्रदत्त सृष्टि अद्भुत,
किसी भी कण का नेह न टूटे।
धैर्य से बने धर्मात्मा,
बस धीरज का छोर न छूटे॥

धरा के धैर्य को समझो,
हर पल घुटता इसका दम।
हर जीव का पेट भरती,
करती नहीं कर्तव्य को कम॥

जगत का आधार जननी,
शिशु को नौ माह गर्भ में पाले।
असहनीय प्रसव-पीड़ा प्यारी,
फिर भी धीरज के नहीं तोड़े ताले॥

अहिल्या, शबरी का अखंड धीरज,
राम, सीता, कौशल्या, देवकी का इंतज़ार।
मात-पिता से बिछड़े कन्हैया,
संयम से पाया यशोदा-सा प्यार॥

प्रह्लाद, मीरा का अडिग विश्वास,
उर्मिला, भरत की अटल प्रतिज्ञा।
गरीबी में भी कलाम बने राष्ट्रपति,
समय भी इस धैर्य की कर न पाया अवज्ञा॥

प्रकृति परिवर्तनशील,
ऋतुएँ आएँ बारी-बारी।
मन से नहीं होती ये,
सर्वत्र खिलाती मनोरम फुलवारी॥

पशु-पक्षियों का धैर्य उत्साही,
जो मिले उसी में संतुष्ट।
मानवीय प्रकृति चंचल,
क्षण भर में हो जाता रुष्ट॥

हार-जीत जीवन के पहलू,
इनका साहस से करें सामना।
धरा-आकाश भी दें आशीष,
पूरी हो अवश्य मनोकामना॥

शांति में सुख की अनुभूति,
मन का संयम बड़ा ज़रूरी।
सहिष्णुता की डोर पकड़ ले,
हट जाएँगी सब मजबूरी॥

फूलों-सा कोमल ये मन,
मानेगा हर बात।
धीरज का छोर न छूटे,
खुशियों की होगी बरसात!

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