महकते ख़्वाबों की रात

घर मेरा किसी अनजानी ख़ुशबू से महकने लगा था। जाने क्यों, हर कोने में उसकी आहट गूंजने लगी। फ़िज़ाओं में कोई चाप नहीं थी, फिर भी सन्नाटा जैसे टूटने लगा। मैंने तो किवाड़ बंद रखे थे, पर लगता है कोई ख़्वाब दरवाज़ा खटखटा गया। रातें अब पहले जैसी तन्हा नहीं रहीं — एक उम्मीद थी कि शायद दूरी मिटेगी, और इसी ख़याल से दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। जब आखिर मैंने दरवाज़ा खोला, तो हवाओं के साथ आए अरमानों का दीया बुझ गया — जैसे किसी अधूरी मुलाक़ात ने अपनी कहानी वहीं ख़त्म कर दी हो।

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मेरा घर कौन-सा…?

यह कविता एक स्त्री की आत्मसंवेदना और उसके भीतर के संघर्ष का मार्मिक चित्रण करती है। वह बताती है कि कैसे समाज और परिवार की परंपराओं के बीच जीते-जीते वह स्वयं अपने ही घर में पराई बन जाती है। मन की पीड़ा इतनी गहरी है कि वह धीरे-धीरे उस “गैरपन” की स्थिति की अभ्यस्त हो जाती है — जैसे किसी ने अपनी पहचान को कुहासे में ब्याह दिया हो।
कविता में “एक धुंध से निकलकर दूसरी धुंध में” जाना, जीवन की निरंतर उलझनों और अस्पष्टताओं का प्रतीक है। वर्जनाओं से घिरी हुई स्त्री फिर भी अपनी “कामनाओं” को निर्बाध बहने देती है, क्योंकि वही उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। अंत में “मेरा घर कौन-सा…?” यह प्रश्न केवल भौतिक घर का नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और आत्मीयता की खोज का प्रतीक बन जाता है। यह कविता स्त्री-मन की उस पीड़ा को उजागर करती है, जो प्रेम, संबंध और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच अपनी पहचान तलाशने का प्रयास कर रही है।

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आइना पूछता है…

आइना अब मुझसे पूछता है कि मैं कौन हूँ, किसकी तस्वीर हूँ। मेरा चेहरा तो सामने है, लेकिन मेरी परछाईं में किसी और की तासीर बसती है। पलकों पर ठहरे मौसम और होठों पर आधी मुस्कान—यह सब उसने छोड़ा था, शायद किसी अनकहे ग़म की पहचान के तौर पर। हर दिन सवेरा आता है, लेकिन उजियारा अधूरा-सा लगता है। रास्ते वही हैं, कदम वही हैं, पर मन अब पूरा नहीं लगता। मेरे भीतर यादों का एक घर है, जहाँ खामोशियाँ अपनी भाषा में बोलती हैं। जब मैं आइने में खुद को देखता हूँ, तो लगता है कि वह अब भी मुझमें कहीं डोलती हैं। शायद इसी वजह से आइना एक दिन डर गया—कैसे दिखाए वो सूरत, जो अब किसी और के असर में जी रही है।

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जरूरी

दामोदर ने कहा, “शहर में तीन दिन से कर्फ्यू था। आज हटते ही दो सौ रुपए की मजदूरी हुई। कल बाबा का श्राद्ध है, कुछ किराना ले आता हूँ।”
पत्नी ने चिंता जताई, “अम्मा की तबियत देख लो, पांच बार उल्टी की और बुखार भी तेज है।”
दामोदर ने पूछा, “फिर क्या करूँ?”
पत्नी ने कहा, “नुक्कड़ वाले डॉक्टर साहब के पास चलो। इलाज जरूरी है।”दामोदर ने मान लिया, “हाँ, सही है। पहले अम्मा का इलाज।”

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हलफनामा

पुरुष ने बड़ी कुशलता से मिट्टी और स्त्री में बीज बोने के अधिकार अपने अधीन कर लिए। उसने सब कुछ नियंत्रित किया, जिसमें स्त्री के मस्तिष्क का एक छोटा सा कोना भी शामिल था। दिखावे की रंगीन दुनिया में उसने बड़ी सफाई से अपना भार स्त्री के कंधे पर डाल दिया।

अब, जब स्त्रियों ने पुरुष सत्ता-कमान को कुशलता से संभाल लिया है, पुरुष तुरंत नए आदर्श स्थापित करने में जुट गया। अपराध भाव और जकड़न की स्थिति में विद्रोह की लौ को स्त्रियों ने सहजता से दबा दिया। यह धीरे-धीरे एक नए हलफनामे में तब्दील हो रहा है, जो बदलाव और संतुलन की दिशा में संकेत देता है।

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उससे मिलना

बहुत समय बाद उससे मिलकर मन को एक अजीब सुकून मिला। मैं उसे याद करता था जब वह बहुत छोटी थी — बिल्कुल गुड़िया जैसी। अब वह शादी-शुदा है, पति और बच्चे हैं, और एक खुशहाल जीवन जी रही है। यह देखकर मेरे चेहरे पर स्वाभाविक हँसी खिल उठी।

इतनी सम्पन्नता के बावजूद उसकी फितरत नहीं बदली है। उसकी सम्मोहक और उन्मुक्त हँसी, अविश्वसनीय सरलता और निहायत शालीनता आज भी बरकरार है। मैं सोचता हूँ कि कैसे वह उन मर्यादाविहीन लोगों से निपटती होगी, जो हमारे बीच निशंक घूमते हैं। ऐसे लोग अपने बीच होने पर यह भरोसा दिलाते हैं कि दुनिया आज भी सुन्दर है। उनकी मौजूदगी यह अहसास कराती है कि अच्छाई और बुराई की सतत लड़ाई में अंततः कौन जीतेगा, यह सुनिश्चित है।

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क्या होता है आखिर

जीवन में सब कुछ पाना शायद ही कभी संभव होता है। हर बार कुछ न कुछ बच जाता है — पूरा भर जाने के बाद भी रिक्तता का अनुभव बना रहता है। यह कुछ ऐसा है जैसे काले बादलों की ओंट में बचा थोड़ा सा पानी, या भोर की हल्की रोशनी में मिली रात की सहमी-सी कहानी।

प्रिय से मिलने के बाद उसका इंतजार, कटे हुए दरख़्त में फूटती नई हरित कोपलें, सुनसान जंगल में पंछियों के घोंसले, मंदिर की मूर्ति को बार-बार निहारने की इच्छा — ये सब दर्शाते हैं कि कुछ भी कभी पूरा नहीं होता। हमेशा कुछ-न-कुछ बच जाता है, आस-पास ही, जिसे महसूस करना और जीना ही जीवन का सच है।

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अमन की जोत फिर जलाना है

यह जीवन बस एक बहाना है — सांसों का आना-जाना, रिश्तों का मतलब और फर्ज़ निभाने की रस्में। अमीरों की थालियाँ भरी हैं, मगर गरीब का निवाला उनसे छिन गया है। मुफ़लिसी की बातें अब किससे कही जाएं, जब ज़माना इतना बेरहम हो गया है।

आईने अब चेहरों को नहीं, दिलों को पढ़ने लगे हैं — नया चेहरा, मगर दिल वही पुराना। विज्ञान के इस दौर में इंसान चाँद पर घर बसाने की सोच रहा है, जबकि ज़मीन पर जंगल सूने और परिंदे बेघर हो गए हैं।

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साथ मेरा…..

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई) हर सांचे में ढलने का हुनर रखती हूंकहर बरपा हो तो भी साथ निभाने काहुनर रखती हूंफेरों का हो या ना हो बंधनवादे करके निभाने काहुनर रखती हूंतेरे दुख में , तू ना डूबे यह भी हुनर रखती हूंतेरे सुख में , तू ना बहके यह भी हुनर रखती हूंबस…

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अमिताभ की ‘अक्स’ से अपनी ‘अक्स’ तक

अमिताभ बच्चन के 83वें जन्मदिन पर एक्स पर उन्हें बधाई देते हुए उनकी फ्रेंच कट दाढ़ी को लेकर एक विचार आया—आख़िर ये दाढ़ी वे कब से रख रहे हैं? यह सोचने की वजह भी खास थी, क्योंकि अपन भी ऐसी ही दाढ़ी वाले हैं।

अस्सी के दशक में मुंबई में बाल ठाकरे ने इस दाढ़ी को लोकप्रिय बनाया। फिर प्रीतिश नंदी और अमिताभ बच्चन—इन तीनों की पहचान इस स्टाइल से जुड़ी रही। गूगल बाबा ने बताया कि बिग बी की फ्रेंच कट दाढ़ी 24 साल की हो गई है—फिल्म ‘अक्स’ (2001) से शुरू हुई यह पहचान अब स्थायी बन चुकी है।
और अपन? हमारी दाढ़ी तो 39 साल पुरानी! शादी के दिन (1986) भी यह चर्चा में रही—जब एक रिश्तेदार ने हँसकर पूछा, “कंवर साब, दाढ़ी नहीं कटवाई?” तो जवाब दिया—“आपको मेरी दाढ़ी से फेरे पड़वाने हैं या मुझसे?” ठहाके गूंज उठे, बात वहीं खत्म।

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