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इंतज़ार में डूबी प्रेमिका, जो अपने प्रिय की याद में खिड़की के पास बैठी है

तुम दूर हो या क़रीब ?

जब संवाद थम जाता है और इंतज़ार लंबा हो जाता है, तब प्रेम अपने भीतर सवालों की शक्ल लेने लगता है। यह रचना उसी असमंजस को स्वर देती है, जहाँ नज़दीकियाँ इतनी गहरी रही हैं कि दूरी का अर्थ समझ में ही नहीं आता। प्रेम में किया गया भरोसा, व्यस्तताओं के बीच पनपती बेचैनी और यह डर कि कहीं अपना व्यक्ति धीरे-धीरे दूर तो नहीं हो रहा इन्हीं भावों के बीच यह कविता पाठक को रिश्तों की सबसे कोमल और सच्ची अनुभूति से जोड़ती है।

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15 फरवरी से खुलेगा पुणे रिवरफ्रंट, जानिए समय, सुविधाएं और पूरा प्लान

पुणे को मिलेगा नया सुकून का ठिकाना

15 फरवरी से रिवरफ्रंट विकास परियोजना का पहला हिस्सा आम नागरिकों के लिए खोलने जा रहा है. यहां वॉकिंग ट्रैक, साइकिल पाथ और हरियाली का अनुभव मिलेगा.

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मुंबई–पुणे एक्सप्रेसवे पर 16 घंटे का जाम, गैस रिसाव जारी, यात्री बेहाल

जाम में फंसी जिंदगी

मुंबई–पुणे एक्सप्रेसवे पर खंडाला घाट में गैस टैंकर पलटने से 24 घंटे से अधिक समय तक यातायात ठप रहा. प्रोपाइलीन गैस का रिसाव अब तक नहीं रुक पाया, जिससे 10 किमी लंबा जाम लगा है और सैकड़ों यात्री बिना खाना-पानी फंसे हुए हैं. पुलिस के अनुसार शाम तक राहत मिलने की संभावना है.

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नीमच में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कंचन बाई मेघवाल ने मधुमक्खियों के हमले से बच्चों को बचाते हुए बलिदान दिया

मानवता की मिसाल: नीमच में बच्चों को बचाते हुए महिला ने दी जान

उस सुबह आंगनवाड़ी परिसर में बच्चों की हंसी गूंज रही थी। किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही मिनटों में यह जगह चीखों, अफरा-तफरी और मौत से टकराने वाली बहादुरी की गवाह बनने वाली है।
अचानक मधुमक्खियों का एक झुंड आंगनवाड़ी में खेल रहे बच्चों पर टूट पड़ा। नन्हे हाथ सिर ढकने लगे, मासूम आंखों में डर तैर गया

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कुछ रंग ऐसे भी… | रिश्तों, धोखे और ख़ामोशी पर विचारशील कविता

कुछ रंग ऐसे भी…

यह कविता जीवन के उस कैनवास की कथा है, जहाँ धोखे और बनावटी रंग इतने फैल जाते हैं कि प्रेम, अपनेपन और आत्मा के रंग खो से जाते हैं, और बचती है केवल ख़ामोश उदासी।

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कठिन पहाड़ी रास्ते पर आगे बढ़ता यात्री, संघर्ष और संकल्प का प्रतीक

चलता चल राही

चलता चल राही” एक प्रेरणादायक कविता है, जो बताती है कि जीवन की राह में कांटे, बाधाएँ और संघर्ष आएँगे, लेकिन रुकना नहीं बस चलते रहना ही विजय का मार्ग है।

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खिड़की के पास बैठा लेखक, वैचारिक लेखन में डूबा हुआ दृश्य

ज्ञान नहीं, बदलाव लिखिए

लेखन का उद्देश्य केवल ज्ञान बाँटना नहीं, बल्कि स्वयं से शुरू होने वाला परिवर्तन होना चाहिए। जब लेखन आत्मचिंतन बनता है, तभी वह समाज को दिशा देता है।

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