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ढोल थम गया, दिल थम गया

कभी शादियों में ढोल की लय और “नागिन डांस” की धुन पर दिल बेक़ाबू होकर थिरक उठते थे। अब कहीं न ताल बची है, न वो मस्ती। DJ के शोर में मानो रिश्तों की गर्माहट दब गई है। दूल्हा-दुल्हन भी कैमरे की कैद में इतने बंध गए हैं कि लगता है मानो शादी नहीं, कोई बड़ा फोटोशूट चल रहा हो। कभी घरों में उठने वाली खुशी, हँसी-ठिठोली और अपनापन अब बस दिखावे की चमक में धुंधला गया है। वक्त बदल गया है पर शायद मन अब भी उसी खोई हुई सरलता, सादगी और आत्मीयता को खोज रहा है।

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'दुनिया कमाल है' शीर्षक वाली सामाजिक सरोकार और इंसानियत पर आधारित हिंदी-उर्दू नज़्म

ब-उनवान: दुनिया

‘दुनिया कमाल है’ एक मार्मिक नज़्म है, जो आज के समाज में बढ़ते झूठ, छल, हिंसा और मानवीय मूल्यों के पतन को संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त करती है। रचना युद्ध, स्वार्थ और टूटते रिश्तों के बीच प्रेम, भाईचारे और इंसानियत की पुकार बनकर सामने आती है। अंत में कवयित्री एक ऐसे संसार की कल्पना करती हैं, जहाँ शांति, स्नेह और मानवता की खुशबू हर दिशा में फैले। यह नज़्म पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।

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ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…

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भक्ति और श्रद्धा के सागर में डूबा नगर

नगर में आध्यात्मिक उल्लास और भक्ति की अनुपम छटा देखने को मिली, जब श्रीराम हनुमान मंदिर सेवा समिति के तत्वाधान में श्रीमद् भागवत कथा का शुभारंभ भव्य कलश यात्रा के साथ हुआ. बैंड-बाजों की मधुर धुन, ढोल-नगाड़ों की थाप और हरिनाम के जयघोष से पूरा नगर भक्तिमय वातावरण में सराबोर हो गया. सैकड़ों श्रद्धालुओं की सहभागिता, पुष्पवर्षा और श्रद्धा भाव ने इस पावन आयोजन को अविस्मरणीय बना दिया. पं. सुनीलकृष्ण व्यास के ओजस्वी प्रवचनों ने कथा के प्रथम दिवस को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया, जिससे नगरवासियों में शांति, भक्ति और आनंद का संचार हुआ.

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इश्क़ और जुदाई

ज़िंदगी अब बेबस-सी हो गई है, मानो किसी अपने को खो देने के बाद उसका सहारा ही छिन गया हो। आँखों में आँसू हैं, जिन्हें नजरों में छुपाकर रखा गया है। तालीम और सीख की राह इतनी आसान नहीं होती, क्योंकि उस्ताद को नादान बनाकर कभी सीखा नहीं जा सकता।
अहसान का कर्ज़ कभी अदा नहीं हो सकता, और फिर भी लोग फर्ज़ भूलकर अहसान को भी भुला देते हैं। जब यादों की धूप छूने लगती है तो उदासी का साया पास बैठ जाता है।इश्क़ कोई बाज़ी नहीं, बल्कि दिल का अफसाना है। इसे जीतने के लिए चुराना पड़े तो उसमें मज़ा नहीं रह जाता। नादान दिल इश्क़ में डूब चुका है, आँसुओं के सैलाब में बरबाद हो गया है।

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अनुराग और आत्मप्रेम की अनुभूति को दर्शाती भावपूर्ण हिंदी कविता 'मेरा अनुरागी मन'

‘मेरा अनुरागी मन’

‘मेरा अनुरागी मन’ आत्मप्रेम, अनुराग और जीवन में प्रेम के पुनर्जागरण की एक संवेदनशील कविता है। इसमें वैराग्य से श्रृंगार तक की भावयात्रा, बसंत की तरह लौटती मुस्कान और भीतर बसे दिव्य प्रेम का सुंदर चित्रण किया गया है।

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मां…

“मॉं” में माँ को जीवन का आधार, हृदय की आवाज़ और आत्मा का सहारा बताया गया है। माँ केवल काया नहीं, बल्कि माया, अनुशासन, संस्कार और ईश्वर की आराधना का प्रतीक हैं। बच्चे की किलकारी, परिवार का बंधन और घर की यादें माँ की खुशी और शक्ति का हिस्सा हैं। कविता यह दर्शाती है कि माँ का अस्तित्व, उनका स्नेह और उनका मार्गदर्शन जीवन की हर परिस्थिति में अनमोल हैं और उनके नाम का पन्ना कभी फटता नहीं।

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हिसाब–किताब में कच्ची हूँ

मैं हिसाब–किताब में कच्ची हूँ, लेकिन दिल से अब भी बच्ची ही हूँ। जोड़-घटाना ज़्यादा नहीं आता और भाग भी कुछ कम ही आता है। किसको क्या दिया था, यह भी याद नहीं रहता क्योंकि दिमाग़ ज़्यादा लगाना मेरी आदत नहीं। मुझे बस थोड़े से सुकून की तलाश रहती है और उसके लिए मैं किसी के पीछे भागती नहीं। मेरी कोशिश यही रहती है कि खुशी के छोटे-छोटे पल कहीं छूट न जाएँ, इसलिए उन्हें अपनी मुट्ठी में कैद कर लेती हूँ। दुख के बीते पल मैं रेत की भाँति बहा देती हूँ। इस तरह, मुट्ठी में समाए हुए पल मेरे अपने हो जाते हैं और दुख के सारे पल पीछे ही छूट जाते हैं।

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कंचनमाला अमर हिंदी लेखिका

कंचनमाला ‘अमर’: बहुआयामी हस्ताक्षर 

हिंदी साहित्य की सशक्त और बहुआयामी हस्ताक्षर कंचनमाला ‘अमर’, जिन्हें साहित्यिक जगत में ‘उर्मी’ के नाम से भी जाना जाता है, एक प्रतिभाशाली लेखिका, शिक्षिका, गायिका और कला-साधिका हैं। उनका व्यक्तित्व शिक्षा, कला और साहित्य के सुंदर समन्वय का जीवंत उदाहरण है।

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सावन सोमवार पर हास्य व्यंग्य लेख, शिव भक्ति और जीवन का संदेश

सावन सोमवार और रिश्तों की तलाश

सावन सोमवार आते ही व्रत, पूजा और मनचाहे वर की कामनाओं का दौर शुरू हो जाता है। लेकिन क्या सिर्फ उपवास से जिंदगी की खुशियां मिल जाती हैं? एक हल्के-फुल्के अंदाज में यह व्यंग्य बताता है कि खुद को बेहतर बनाना, अच्छे कर्म करना और जीवन का आनंद लेना भी उतना ही जरूरी है।
सावन का मजा लीजिए, भक्ति को सच्चे मन से निभाइए और खुद को इतना काबिल बनाइए कि खुशियां खुद आपके दरवाजे तक आएं।

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