शायद माँ आयी है
‘शायद माँ आई है’ एक ऐसी भावनात्मक कविता है जिसमें माँ सीधे दिखाई नहीं देती, लेकिन उसकी आदतें, सहेजने का ढंग और प्रेम घर के हर कोने में महसूस होता है। यह कविता मातृत्व की उस अनकही उपस्थिति को शब्द देती है जो हमेशा साथ रहती है।

‘शायद माँ आई है’ एक ऐसी भावनात्मक कविता है जिसमें माँ सीधे दिखाई नहीं देती, लेकिन उसकी आदतें, सहेजने का ढंग और प्रेम घर के हर कोने में महसूस होता है। यह कविता मातृत्व की उस अनकही उपस्थिति को शब्द देती है जो हमेशा साथ रहती है।
महाकाल क्षेत्र में एक महिला ने अपनी दुकान में तोड़फोड़ और 60 हजार रुपये लूटे जाने का आरोप लगाया है. पीड़िता के अनुसार, पड़ोसी दुकानदार लगातार दबाव बनाकर दुकान पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे थे, जिसके बाद मामला पुलिस तक पहुंच गया.
यह कविता एक आत्मस्वीकृति है — एक बेटी की अपनी माँ के प्रति संवेदनाओं, निरीक्षणों और अनुभवों की गहराई से उपजी भावनाओं की अभिव्यक्ति। वह कहती है कि वह अपनी माँ की खामोशी पढ़ लिया करती थी, माँ के संघर्षों और त्याग की साक्षी रही है। माँ की आँखों में छिपे दर्द, जीवन की कठोर सच्चाइयों से संघर्ष, और अपनी इच्छाओं को निस्वार्थ भाव से दबा देने का दृश्य उसने बार-बार देखा।
वह माँ की हर वह चुप्पी पहचानती थी, जिसे दुनिया अनदेखा कर देती है। माँ के आँचल से आँसू पोछने से लेकर, चाँदनी रातों में अपने दुखों से बात करने तक की हर एक लम्हा, बेटी के मन में गहरे बैठ गया।
क्या आपने कभी बिना शराब पिए नशे का अनुभव किया है? यह थकान या कमजोरी नहीं, बल्कि ऑटो-ब्रुअरी सिंड्रोम जैसी दुर्लभ बीमारी का संकेत हो सकता है, जिसमें आपके शरीर के भीतर कुछ बैक्टीरिया खुद शराब बनाते हैं।
यह कविता एक आत्मीय संवाद की तरह है जिसमें जीवन से धीमे चलने की विनती की गई है। इसमें अकेलेपन, कठिन रास्तों और यादों की संगत को बहुत सहज भाव से व्यक्त किया गया है। कवयित्री कहती है कि जिन्दगी ने अपने हिस्से की धूप तो दी, पर अब वह ठंडी हवाओं और तन्हा रास्तों के बीच खुद को समेटे हुए है। बावजूद इसके, भीतर कहीं एक उम्मीद अब भी जीवित है कि शायद कोई राह ज़रूर होगी जो उसे उसके “जीवन” तक पहुँचा देगी।
अखिल भारतीय हिंदी उर्दू एकता अंजुमन’ संस्था द्वारा बाहरी दिल्ली के नांगलोई इलाके में एक शानदार मुशायरा और कवि सम्मेलन (एक शाम एहतराम सिद्दीकी के नाम) का आयोजन सुरभि स्टूडियो में किया गया। इसकी सदारत मशहूर शायर ख़ुमार देहलवी साहब ने की। मुख्य अतिथि फहीम जोगापुरी, अनिल मीत और अनस फैज़ी रहे।
मुशायरे का आगाज़ ताबिश खेराबादी ने ‘नात-ए-पाक’ से किया। निज़ामत असलम बेताब ने बेहद खूबसूरत अंदाज़ में निभाई। इस मुशायरे में दिल्ली और इसके आसपास के शहरों से आए लगभग 35 शायरों और शायरा ने शिरकत की और अपने-अपने कलाम पेश किए, जिन्हें वहाँ मौजूद श्रोताओं ने खूब सराहा।
उज्जैन में गंगा दशहरा उत्सव के दौरान जूना अखाड़े ने अधिकमास के कारण पेशवाई और नीलगंगा सरोवर में होने वाले स्नान कार्यक्रम स्थगित कर दिए। हालांकि संतों ने मां शिप्रा और चिंतामन गणेश का विधिवत पूजन किया। अब केवल मां गंगा की आरती आयोजित की जाएगी।
परवरिश, दरअसल वह निरंतर साधना है जहाँ संतान रूपी बीज को हम प्रेम, स्नेह और संस्कार की सिंचाई से अंकुरित करते हैं। समय-समय पर उचित मार्गदर्शन और देखभाल से यह पौधा धीरे-धीरे एक ऐसे वृक्ष में बदलता है, जो भविष्य में न केवल जिम्मेदार और संवेदनशील होता है, बल्कि समाज और परिवार के लिए फलदायी भी सिद्ध होता है।
यह कविता रिश्तों, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों की गहराई को दर्शाती है, जिसमें बुज़ुर्गों का सम्मान, बेटियों की सुरक्षा और समाज के प्रति जिम्मेदारी का सुंदर संदेश दिया गया है।
यह कविता नागफनी की रूखी शाख़ पर खिले पहले फूल के दृश्य से आरंभ होती है, जो कवि के भीतर एक गहरी, धीमी लहर की तरह उतरता है। यह दृश्य उसे तुम्हारे श्वेत-श्याम जीवन पर चमकती लाल बिंदी, या बरसों बाद आसमान में उतरे इंद्रधनुष जैसा लगता है। लेकिन कवि सवाल करता है कि तुमने अपने चारों ओर यह कठोर आवरण क्यों बना रखा है, जबकि उसने तुम्हारे भीतर मुस्कान का पहला अंकुर, उसका नन्हा पल और एक सांस लेता हुआ बीज देखा है। वह आग्रह करता है कि इस बीज को बढ़ने, खिलने, फलने का अवसर दो—वरना यह भ्रूणहत्या होगी, चाहे वह भ्रूण नौकरीपेशा ही क्यों न हो, जो काँटों के जंगल में भी फूल की आस रखता है। अंत में, कवि आश्वस्त करता है कि यही बीज नागफनी में भी सुगंध फैला देगा और वह स्वयं, दिल की बाहें फैलाए, उसे समेटने को तैयार है।