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मुद्दों की बात हम करते नहीं…

हम इस देश में असल मुद्दों पर बात करना पसंद नहीं करते। हमें झंझट पसंद नहीं, इसलिए टूटी सड़कों, मिलावट वाले खाने, बढ़ते कंक्रीट, बिजली-पानी की किल्लत तक सब सहते जाते हैं। भ्रष्टाचार और महंगाई बढ़ती रहे, पर्चे बिकते रहें, कूड़े के पहाड़ बन जाएँ फिर भी फर्क नहीं पड़ता। हम तमाशा देखते रहते हैं। असल में हमें मुद्दे नहीं, आराम चाहिए। यही वजह है कि हालात बदलते नहीं और हम भी नहीं।

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आजोल यूथ क्लब के क्रिकेट महाकुंभ में उमड़ा जोश

मुंबई के कांदिवली स्थित स्पोर्ट्स अकादमी का माहौल रविवार, 16 नवंबर को सुबह से ही क्रिकेट के रंग में रंग चुका था. अजोल यूथ क्लब द्वारा आयोजित वन-डे लिमिटेड ओवर क्रिकेट टूर्नामेंट ने युवाओं में ऐसा जोश भर दिया कि पूरा मैदान तालियों, शोरगुल और उत्साह के नारों से गूंज उठा. टूर्नामेंट का शानदार आगाज़ मातोश्री उर्मिलाबेन शाह परिवार के हाथों शुभारंभ के साथ हुआ.

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शताब्दी समारोह की ऐतिहासिक गूंज

भारतीय रेलवे की ऐतिहासिक धरोहरों को नई पीढ़ी से जोड़ने के उद्देश्य से मध्य रेल ने ‘स्टेशन महोत्सव’ के तहत मुंबई मंडल के 6 हेरिटेज स्टेशनों पर शताब्दी समारोह का आयोजन किया। रेलवे बोर्ड की सलाह पर आयोजित इस विशेष समारोह ने छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी), रे रोड, आसनगांव, वासिंद, कसारा और इगतपुरी स्टेशनों को इतिहास, संस्कृति, तकनीक और उत्सव के रंगों से सराबोर कर दिया।

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मैं हाउसवाइ़फ बनना चाहती हूँ…

“कृष्णा जानती थी — उसे यही आज़ादी चाहिए थी। अपने बच्चों के लिए… अपने परिवार के लिए… एक हाउसवाइफ़ बनकर वो सबसे आज़ाद और पूर्ण महसूस कर रही थी। यह उसकी पसंद थी, समझौता नहीं।”

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चिट्ठी उनके नाम की कविता

चिठ्ठी उनके नाम की

एक खूबसूरत हिंदी कविता “चिट्ठी उनके नाम की” जिसमें यादें, प्रेम और भावनाओं की गहराई को शब्दों में पिरोया गया है। दिल को छू लेने वाली यह कविता

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उज्जैन गर्मी समाचार

अप्रैल में ही भीषण गर्मी का प्रकोप, पारा 43 डिग्री पार

उज्जैन में भीषण गर्मी का प्रकोप, तापमान 43 डिग्री पार. प्रशासन ने 1 से 8वीं तक के स्कूल बंद किए, 9–12वीं का समय बदला. जानिए पूरी खबर.

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दीवार

कहानी एक सफल लेकिन अकेले हो चुके इंसान— रविन्द्र के दर्द को दिखाती है। महंगे बंगले, नाम, शोहरत और पैसा होने के बावजूद वह अंदर से टूट चुका है, क्योंकि उसकी माँ अब नहीं रही। उसने माँ से वादा किया था कि उसे हर सुख देगा, पर उसी “बड़े मकान की दीवारों” ने बेटे और माँ के बीच दूरी बना दी। माँ शायद आख़िरी वक़्त में दर्द में थी, पर रविन्द्र को पता न चला क्योंकि “दीवारों” ने आवाज़ और अहसास रोक लिए।रविन्द्र आज पछता रहा है कि असली घर प्यार और साथ से बनता है, दीवारों से नहीं।यही दर्द और पछतावा पूरी कहानी का मूल है।

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खानदानी लोग

मेहनत और आत्मसम्मान के बल पर आगे बढ़ी मीना, शोध के दौरान अपने मार्गदर्शक राहुल से प्रेम कर बैठती है। तीन वर्षों के संबंध के बाद राहुल जाति-घमंड और स्वार्थ के आगे प्रेम को नकार देता है। मीना के सपने, विश्वास और आत्मा सब एक साथ टूट जाते हैं, और वह सामाजिक क्रूरता का नंगा सच देखती है।

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छोटी मदद, बड़ा असर

मॉल में आम दिन जैसा लग रहा था, लेकिन 4 साल की आन्या ने दिखा दिया कि छोटी-सी मदद भी बड़ा असर डाल सकती है। अपने बलून और कपकेक्स का पैकेट लिए वह मुस्कुराते हुए उस बच्ची को दे देती है, जिसे कोई नहीं देख रहा था। माता-पिता की नजरों के सामने यह नन्हीं सी मानवता का सबक, उनके दिलों को छू जाता है और समाज में मदद और दयालुता का संदेश फैलाता है।

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तन्हाई: भीड़ में खोई आत्मा

तन्हाई…

यह कविता “तन्हाई” इंसान के उस दर्द को उजागर करती है, जब वह भीड़ में रहकर भी खुद को अकेला महसूस करता है। इसमें जीवन के संघर्ष, टूटे सपनों और भावनात्मक खालीपन को बेहद संवेदनशील शब्दों में व्यक्त किया गया है।

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