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पर्यावरण संरक्षण के लिए पुणेकरों ने चलायी साइकिल

पुणे: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मदिवस पर राज्यसभा सांसद प्रा. डॉ. मेधा कुलकर्णी की पहल से आयोजित ‘पुणे ऑन पेडल्स’ साइकिल रैली और वॉकथॉन में हजारों पुणेकरों ने भाग लेकर शारीरिक स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इस अवसर पर 75 जरूरतमंद बच्चों को साइकिल वितरण भी किया गया।

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विश्व हिंदी दिवस समारोह में हैदराबाद में त्रिभाषा अधिवेशन साहित्य सम्मान प्राप्त करतीं मेघा अग्रवाल

हैदराबाद में मेघा अग्रवाल को मिला त्रिभाषा साहित्य सम्मान

विश्व हिंदी दिवस 2026 के अवसर पर हैदराबाद में आयोजित त्रिभाषा अधिवेशन एवं कवि सम्मेलन में नागपुर की साहित्यकार मेघा अग्रवाल को साहित्य सम्मान प्रदान किया गया। उनके सशक्त काव्यपाठ को श्रोताओं ने खूब सराहा।

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बेटे का इंतजार करती मां की भावुक और प्यार भरी यादें –

बाई, आज तू होती तो…

बाई की वह मुद्रा कभी अचानक नहीं होती थी. पूरा महीना इंतज़ार करने के बाद, जब मैं पुणे से अपने घर लौटता, तो माँ हमारे पहले मकान के पहले कमरे में खिड़की खोलकर बैठी होती थी. कहने को तो वह दूध लेने वाले का इंतज़ार कर रही होती थी, पर असल में उसे मेरा ही इंतज़ार होता था. जैसे ही मैं दरवाज़े से भीतर कदम रखता, वह हल्की-सी मुस्कान के साथ एक ही नज़र में मेरा पूरा एक्स-रे कर लेती.. दुबला तो नहीं हुआ, काला तो नहीं हो गयाए बाल और स़फेद हुए या डाई नहीं की. कुछ भी उससे छुपा नहीं रहता था.

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एक कतरा प्यार

वह मुझसे नहीं, मेरे वजूद के सिर्फ एक छोटे से अंश से प्यार कर बैठा। उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं कि मेरे बाकी हिस्सों में कितनी कहानियाँ, कितने घाव और कितनी चुप्पियाँ दबी पड़ी हैं। मेरी हँसी के पीछे छुपे आँसू, मेरे सुकून के पीछे की बेचैनी, और मेरी तन्हाइयों के पीछे की चीखें ये सब उसकी समझ से बहुत दूर हैं।

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खिड़की पर तिनके लिए बैठी एक नन्ही गौरैया, जो आशा और जीवन की ऊर्जा का प्रतीक दिखाई दे रही है।

गौरैया

खिड़की पर आकर चहकती गौरैया केवल एक पक्षी नहीं लगती, बल्कि जीवन की जिद और आशा का जीवंत रूप प्रतीत होती है। नन्ही चोंच में तिनके दबाए वह जैसे हर बार याद दिलाती है कि टूटे हुए घोंसले भी फिर से बसाए जा सकते हैं। उसकी चपल उड़ान और निरंतर प्रयास उस मन से संवाद करते हैं, जो उदासी और पीड़ा के बोझ तले थक चुका है। यह कविता गौरैया के माध्यम से जीवन, आशा और भीतर फिर से घर बनाने की इच्छा को संवेदनशीलता से अभिव्यक्त करती है।

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भव्य बंगले में जन्मदिन समारोह के बाद अकेली बैठी एक महिला, जिसके पास उसकी बहू सहानुभूति से बैठी है, रिश्तों और मानवता का भावनात्मक दृश्य।

सुनहरी ज़ंजीरें

मुंबई के पॉश इलाके में समुद्र के किनारे बना “रत्नालय” दूर से किसी महल जैसा दिखाई देता था। ऊँची दीवारें, चमचमाती काँच की खिड़कियाँ, विदेशी गाड़ियाँ और हर समय आने-जाने वाले लोगों की भीड़—ये सब कुछ उस आलीशान घर की हैसियत बयान करती थीं।

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सोच

सोच ही हमें भीड़ से अलग करती है। दौलत नहीं, असली संपत्ति हमारी सोच है जो जीना सिखाती है, दोस्त मिलाती है, और इंसान को महान बनाती है।

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हरीतिमा

हरीतिमा कविता में कवयित्री ने प्रकृति की सौंदर्यता और उसकी अद्भुत पुनरुत्थान शक्ति को दर्शाया है। अंधड़ में धराशायी हुए वृक्षों के अवशेषों पर फिर से नवपल्लव खिलते हैं, जीवन की जिजीविषा से भरा एक बैंजनी फूलों का कतार उग आता है। कविता यह संदेश देती है कि धरती बिना किसी लेन-देन के अपार स्नेह और जीवन देती है। हरीतिमा का यह निस्वार्थ उपहार कवयित्री के अंतर्मन में कवि के उस अमर वाक्य को बार-बार गूंजने पर विवश करता है – “आ: धरती कितना देती है!”

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महाभारत की सभा में द्रौपदी की करुण पुकार, भगवान कृष्ण द्वारा चीर रक्षा का दिव्य दृश्य

द्रौपदी की करुण पुकार

सभा के मध्य खड़ी द्रौपदी की आँखों में भय, अपमान और आक्रोश एक साथ उमड़ रहे थे। चारों ओर सत्ता के प्रतीक उपस्थित थे, पर न्याय कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। शकुनि के छल से आरंभ हुआ यह खेल अब उसकी अस्मिता पर आकर ठहर गया था। दुर्योधन की क्रूर मुस्कान और दुःशासन की निर्दयता ने सभा को और भी भयावह बना दिया था।
भीष्म और धृतराष्ट्र जैसे महान भी मौन थे, मानो धर्म स्वयं बंधन में जकड़ा हो। उस असहाय क्षण में द्रौपदी के भीतर से केवल एक ही पुकार उठी—कृष्ण। उसने अपने समस्त अहंकार, भय और पीड़ा को त्यागकर स्वयं को पूर्णतः उस परम शक्ति के हवाले कर दिया। और तभी, जब मानवता ने साथ छोड़ दिया, आस्था ने उसका हाथ थाम लिया—अदृश्य होकर भी कृष्ण उसकी लाज की रक्षा के लिए उपस्थित हो गए।

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