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प्रकृति की पुकार

जिज्ञासा सिंह, (पर्यावरण प्रेमी, साहित्यकार एवं ब्लॉगर), लखनऊ आसमान को छू रहा, ऊँचा खड़ा विकास।पशु-पक्षी बेघर हुए, खोजें निज आवास।। प्लॉटिंग के बाज़ार में, बिकते चारागाह।घर-घर छुट्टा जानवर, व्यापारी की वाह।। उमड़-घुमड़ रोती रही, बदली नभ में आज।सर, सरिता और कूप के, बैरी करते राज।। मेढ़क प्यासा ढूँढ़ता, अपना खोया कूप।कंकड़-पत्थर हैं वहाँ, बदल गया…

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ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे

मधु झुनझुनवाला ‘अमृता‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, जयपुर (राजस्थान) मुंतज़िर थे हमीं न कल होंगे ।ये लम्हे क्या कभी अज़ल होंगे । फ़िक्र अब है कहाँ मुहब्बत में,ज़ीस्त में क्यों सनम दख़ल होंगे । दिल बुझेंगे कभी जो फुर्कत में,ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे । बाद मेरे इन्हीं निगाहों में ,अश्क़ में तर हसीं कँवल होंगे…

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भोर की प्रतीक्षा…

जाने कितने जंगलों को पार करती उसकी साँसें मेरे कानों से टकराई थीं। जैसे उसकी डूबती साँसें मुझे पुकार रही हों। मैं और मेरी साँसें उस निराकार ब्रह्मांड के शरणागत थे।एक कवियित्री की आँखों में खारे अश्क़ों की गहरी तरलता भरी थी। उन अश्क़ों ने मानो किसी देव के चरण पखारने की ठान ली थी। विशालकाय, हहराती गंगा में मेरे चंद खारे आँसू भी प्रार्थना में लीन थे।

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मातरानी के अनन्य स्वरूप

मातारानी की महिमा असीमित और अनन्य है। सृष्टि की हर क्रियाशीलता में उनका वंदन और पूजन होता है। दया, शांति, चेतना और सामर्थ्य के प्रतिरूप के रूप में, माँ ज्ञान से पूर्ण प्रकाशपुंज हैं। वह जीवन की सर्वशक्तिप्रदायिनी हैं, जो समस्त जगत की असुरी शक्तियों का संहार करती हैं और यश, रूप, आरोग्य व सौभाग्य प्रदान करती हैं।

माँ अमिय-स्रोत जैसी निरंतर नाद करती हैं और दुष्टों का दमन करने के लिए विकराल रूप धारण कर लेती हैं। प्रचंड दामिनी और रमा कामिनी के स्वरूप में वह भक्तों के हर संताप को हरती हैं और उनके मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।

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मैं हाउसवाइ़फ बनना चाहती हूँ…

“कृष्णा जानती थी — उसे यही आज़ादी चाहिए थी। अपने बच्चों के लिए… अपने परिवार के लिए… एक हाउसवाइफ़ बनकर वो सबसे आज़ाद और पूर्ण महसूस कर रही थी। यह उसकी पसंद थी, समझौता नहीं।”

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डॉ. संजुला सिंह को मिला अंतर्राष्ट्रीय सम्मान

जमशेदपुर की वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार डॉ. संजुला सिंह “संजू” को नेपाल की संस्था द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा सम्मान रत्न 2026 से सम्मानित किया गया। महिला दिवस के अवसर पर उन्हें साहित्य और मातृभाषा के संवर्धन में उत्कृष्ट योगदान के लिए यह अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया गया।

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ऐ वक्त कुछ पल ठहर जा…

ऐ वक्त, ज़रा ठहर तो सही। सदियों से मन में पलते प्रश्न तेरी तेज़ रफ़्तार के कारण अनकहे रह जाते हैं। मैं पूछना चाहती हूँ—कहाँ खो गई वह दुनिया, जहाँ हरियाली और खुशहाली थी, जहाँ पशु-पक्षियों तक में प्रेम और उल्लास था। सूरज की किरणों में वात्सल्य झलकता था, चाँदनी में प्रीत का अहसास बिखरा रहता था।

आज सब कुछ बदल गया है। इंसान इंसान का दुश्मन बन बैठा है, भावनाएँ सूख गई हैं, हमदर्दी लुप्त हो गई है और खुदगर्जी ही राज कर रही है। न मौसम ठीक है, न प्रकृति। हरियाली मिट रही है, खुशहाली खो रही है। इंसानियत बिन मौत ही मर रही है।

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फरमाइश

ज़ख्मों की जलन, स्मृतियों की लहरें और खुशी की राख सब मिलकर दिल पर ऐसा बोझ डाल देते हैं कि मुस्कुराना भी एक फरमाइश-सा लगता है। जब भीतर बुझा हुआ चिराग ही रोशनी तलाश रहा हो, तो हौसले की एक किरण भी बड़ी मुश्किल से जन्म लेती है।

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