तुम और मैं : दो छोर, एक डोर
हम कितने अलग हैं — फिर भी साथ हैं।
तुम दिन हो, उजले और स्पष्ट, जबकि मैं रात हूं — रहस्यमयी, गहराई में डूबी हुई।
तुम स्थिर तट की तरह शांत हो, और मैं बहते झरने की तरह बेफिक्र, निरंतर गतिमान।
तुम पर्वत की तरह अडिग और दृढ़ हो, जबकि मैं हवा की तरह चंचल, हर दिशा में बिखरती हुई।
लड़कियाँ क्रिकेट खेल रही हैं…
ह कविता क्रिकेट के मैदान में उतरती लड़कियों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण, आत्मविश्वास और सामाजिक रूढ़ियों के टूटने की कथा कहती है। चौके-छक्कों से लेकर इतिहास रचने तक, यह रचना बताती है कि खेल कैसे करोड़ों लड़कियों के भीतर साहस और आकाश छूने की आकांक्षा जगा रहा है।
महात्मा गांधी आगमन की शताब्दी पर राष्ट्रीय समारोह
भागलपुर में महात्मा गांधी के आगमन की शताब्दी पर राष्ट्रीय स्तर पर बहुआयामी समारोह आयोजित किए जाएंगे। गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष प्रकाश चंद्र गुप्ता ने घोषणा करते हुए बताया कि कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को गांधी के विचारों और मूल्यों से जोड़ा जाएगा। झारखंड तक निकली गांधी स्मृति यात्रा में प्रो. मनोज कुमार, डॉ. मनोज मीता और प्रसून लतांत सहित कई गांधीवादी कार्यकर्ता शामिल रहे।
जन्म कल्याणक महोत्सव में भक्ति में डूबा महिदपुर रोड
महिदपुर रोड में भगवान नेमिनाथ के जन्म कल्याणक महोत्सव का भव्य आयोजन हुआ. गिरनार तीर्थ की प्रतिकृति, शक्रस्तव अष्टोत्तरी महाभिषेक, 14 महास्वप्नों की प्रस्तुति और भक्ति नृत्य ने आयोजन को विशेष बना दिया.
“जहां से मैं शुरू हुई, वहां मैं नहीं रुकी”
प्रभा ने जीवन भर त्याग और समर्पण सीखा, लेकिन जब अपनी बेटी की बातों ने उसे आईना दिखाया, तो उसने खुद के अस्तित्व की तलाश शुरू की। आज, वह सिर्फ किसी की पत्नी या बहू नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, एक मार्गदर्शक और एक सफल स्त्री है — अपनी पहचान के साथ।”
मैं इक किताब…
हम सबके भीतर एक कोरा पन्ना होता है, जिस पर समय और अनुभव धीरे-धीरे अपने रंग भरते हैं। इन्हीं रंगों से जीवन की कहानी बनती है. कभी खुशी, कभी अधूरी इच्छाओं के साथ। अंततः यही भावनाएँ हमें एक ऐसी किताब में बदल देती हैं, जिसे हम जीते भी हैं और समझते भी हैं।
त्यौहार
त्यौहार का समय फिर से आया। हल्दी-कुमकुम का त्यौहार आया, सुहागिनों ने श्रृंगार किया, गजरा सजाया, माथे पर बिंदी लगाई, हरि-हरी चूड़ियाँ पहनी, हाथों में मेहंदी लगी और गोटा वाली साड़ियाँ पहनीं। पर उस विधवा ने न तो चमकीली साड़ी पहनी, न ही टीका सजाया, और उसके हाथ भी खाली थे। एक बहन थी, जो पति की सताई हुई थी, वह दरिंदे को छोड़कर घर वापस चली आई। सगुना भी रह गई थी, बिन ब्याही, क्योंकि ग़रीब बाबा उसकी सगाई नहीं कर पाए थे।
उनके हाथों में मेहंदी नहीं थी, पांवों में पायल नहीं थी, चूड़ियों की खनक भी नहीं थी। वह सभी भावों से घायल थीं। उन्हें हल्दी-कुमकुम में जाने की मनाही थी। सब बेरंग, गुमसुम और मुरझाई हुई थीं। वेदना की बूँदें उनकी आँखों में समाई हुई थीं।। सभी को हर त्यौहार पर समान अधिकार मिले। तभी पुरुष प्रधान समाज में भी सभी नारियों का सम्मान होगा और रंग भरी क्यारियाँ सुरभित होंगी।
भरोसे की डोर
क्या प्रेम में किसी को खो देने का डर जरूरी है? राघव और रिद्धिमा की कहानी बताती है कि रिश्ते केवल वादों से नहीं, बल्कि ईमानदारी, संवाद, सम्मान और भरोसे से मजबूत बनते हैं।
