gulmohar

घुँघरू

कथक नृत्यांगना के पैरों में बँधे घुँघरू घुँघरुओं की झंकार में छिपे हैं नृत्य, प्रेम, भक्ति और विरह के अनेक भाव।

विजयलक्ष्मी सिंह

घुँघरू की सुंदर प्रतिध्वनि
कानों को लगती प्रिय इतनी,
यह नृत्यकार के चरणों में
झंकृत होती है लगातार।

स्वर, लय, संगीत से सजी हुई,
चरणों की थाप से बँधी हुई,
जब एक कहो तो बाजे एक,
नृत्यकार के मनोभाव अनेक।

कभी शौक में बँधे पग में,
कभी नृत्यांगना के आँगन में,
बज-बजकर जब ये बंद हुए,
सुनसान डगर उस जगह हुई।

कभी प्रेम-पगी मीरा को बँधे,
कभी विरहन को बैरन से लगे,
नूपुर महफ़िल का शृंगार बने,
कभी मन को झंकृत कर गए।

कभी कथक नृत्य के बोल बने,
तबले पर ताताथेई से लगे,
हर थाप पर बोले ताता थेई,
घुँघरू से मन को मिली खुशी।
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घुँघरू
थोड़ी सी नमी बाकी रहने दो
चेहरे और नक़ाब
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आदि शक्ति जगदंबे भवानी
प्रेम मिलन

17 thoughts on “घुँघरू”

  1. घुँघरू के सर्व आयामी पक्षों की सुन्दर अभिव्यक्ति

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