वह दिन शायद मैं जिंदगी भर नहीं भूल पाऊंगी।
मैं अपनी मम्मी को डॉक्टर को दिखाने गई थी। मेरे साथ मेरी दो साल की बेटी और दो-तीन रिश्तेदार भी थे। डॉक्टर का अपॉइंटमेंट रात 8 बजे का था, लेकिन वहाँ काफी भीड़ थी। सिस्टर ने कहा कि अभी एक से डेढ़ घंटे का समय लगेगा। हम बाहर ही बैठ गए। बच्चे सामने खेल रहे थे। मेरी बेटी भी बाकी बच्चों के साथ खेल रही थी। हम सबका ध्यान उन पर था, इसलिए मैं भी थोड़ी निश्चिंत थी।
करीब 10 बजे हमारा नंबर आया। मेरी मम्मी बाकी रिश्तेदारों के साथ डॉक्टर के केबिन में चली गईं और मैं बच्चों के साथ बाहर ही बैठी रही। करीब साढ़े दस बजे वे बाहर आए। बच्चों ने कुछ खाया-पीया और फिर खेलने लगे।
मैं उन्हें देख रही थी।
तभी मेरे एक रिश्तेदार ने कहा, “आप दवाइयाँ समझ लो, कौन-सी कब देनी है।”
मैंने कहा, “बच्चे खेल रहे हैं, पहले इन्हें देखती हूँ, बाद में समझ लूँगी।”
मेरे पास काफी देर से एक अंकल-आंटी बैठे थे। उन्होंने कहा, “आप दवाइयाँ समझ लीजिए, हम बच्चों को देखते हैं। हमारा नंबर आने में भी अभी समय है।”
मैंने सोचा, ठीक है। बच्चे तो सामने ही खेल रहे हैं।
मैं दवाइयाँ समझने लगी।
शायद एक मिनट भी नहीं हुआ होगा। अचानक पता नहीं क्यों, मेरी नज़र फिर बच्चों की तरफ गई। एक नज़र डाली… बाकी बच्चे दिखाई दिए, लेकिन मेरी बेटी नहीं थी।
पहले तो मुझे लगा, शायद थोड़ी दूर चली गई होगी। मैंने आसपास देखा। फिर दूसरी तरफ देखा। फिर उठकर आवाज लगाई।
“बेटा… बेटा…”
कोई जवाब नहीं।
मैंने रिश्तेदारों से पूछा, “वो कहाँ गई?”
अब सब उसे ढूँढ़ने लगे। कुछ ही सेकंड में जो जगह सामान्य लग रही थी, वहाँ अचानक अफरा-तफरी मच गई। कोई इधर देख रहा था, कोई उधर। हम लगातार उसका नाम लेकर आवाज लगा रहे थे, लेकिन वह कहीं नहीं थी।
और तभी मुझे याद आया… मेरे पास बैठे वे अंकल-आंटी कहाँ गए?
कुछ देर पहले तक तो वे वहीं थे। उन्होंने ही तो कहा था कि आप दवाइयाँ समझ लीजिए, हम बच्चों को देखते हैं। लेकिन अब वे वहाँ नहीं थे। वे कब उठकर चले गए, किसी को पता ही नहीं चला।
उस वक्त मेरे दिमाग में कुछ समझ नहीं आ रहा था। बस एक ही ख्याल था, मेरी बेटी कहाँ है?
मैं उसे लगातार आवाज दे रही थी।
“बेटा… आवाज दो… मम्मा यहाँ है…”
लेकिन कोई जवाब नहीं।
समय जैसे रुक गया था। करीब 10 मिनट ही हुए होंगे, लेकिन मुझे वह समय घंटों से भी लंबा लग रहा था।
फिर अचानक मेरे एक रिश्तेदार को दूर से “पा… पा…” जैसी आवाज सुनाई दी। वे उस तरफ दौड़े। और कुछ ही पल बाद उनकी आवाज आई, “यहाँ है!”
मैं भी दौड़कर वहाँ पहुँची।
मेरी बेटी एक गाड़ी के पीछे, एक ईंट के ऊपर बैठी थी। वह बिल्कुल चुप थी। डरी हुई। सहमी हुई।
मैंने उसे देखते ही दौड़कर गोद में उठा लिया। वह मुझे कसकर पकड़कर चिपक गई। उसका शरीर बुखार से तप रहा था।
उस पल मैंने उसे बस सीने से लगा लिया। कुछ पूछने की हिम्मत भी नहीं हुई।
वह इतनी छोटी है कि ठीक से बता भी नहीं सकती कि वह वहाँ तक कैसे पहुँची।
वह खुद गई थी?
किसी ने उसे वहाँ छोड़ा था?
कोई उसे लेकर गया था और फिर वहाँ छोड़ दिया?
मुझे आज भी नहीं पता। और शायद यही बात मुझे सबसे ज्यादा परेशान कर रही है।
मैंने उस समय कोई बड़ा खतरा होते नहीं देखा था। मेरी बेटी सामने ही तो खेल रही थी। आसपास इतने लोग थे। मुझे लगा था कि सब ठीक है।
लेकिन बस एक मिनट के लिए मेरा ध्यान दूसरी तरफ गया… और मेरी बच्ची गायब थी।
आज वह मेरे पास सुरक्षित है, यही सबसे बड़ी बात है। लेकिन उस घटना के बाद बार-बार मन में यही सवाल आता है, अगर वह हमें नहीं मिलती तो? अगर वह सड़क की तरफ चली जाती? अगर कोई गाड़ी वहाँ से गुजरती? अगर वह किसी अनजान व्यक्ति के साथ चली जाती?
इन सवालों का जवाब सोचकर ही दिल बैठने लगता है।
मैं यह बात इसलिए साझा कर रही हूँ, क्योंकि शायद हम सभी कभी न कभी ऐसी ही स्थिति में होते हैं। हमें लगता है कि आसपास लोग हैं, कोई न कोई बच्चे को देख रहा होगा। लेकिन आखिरकार बच्चों की जिम्मेदारी हमारी ही है।
किसी अनजान व्यक्ति पर यह भरोसा नहीं किया जा सकता कि वह हमारे बच्चे पर नज़र रख रहा है।
आज मुझे यह बात बहुत करीब से समझ आई।
मेरी बेटी अभी बहुत छोटी है। वह बता भी नहीं सकती कि उन कुछ मिनटों में उसके साथ क्या हुआ। लेकिन वह डर आज भी उसके चेहरे पर दिखाई देता है। और मेरे मन में भी।
इसलिए बस इतना कहना चाहती हूँ, बच्चों के खेलते समय भी उन पर से नज़र मत हटाइए। भीड़ में तो बिल्कुल नहीं।
क्योंकि कभी-कभी हादसा होने में ज्यादा समय नहीं लगता। सिर्फ कुछ सेकंड काफी होते हैं।
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