
अनुपमा भार्गव
जिंदा हैं हम और
साँसें भी चल रही हैं अभी,
संवेदनाओं की कुछ तो
रवानी रहने दो।
कुएँ, तालाब और बावड़ी
सब सूख गए, पानी
बचा नहीं कहीं भी।
विकल है धरा, प्रकृति, मानव
और संपूर्ण सृष्टि।
कुछ और करो या न करो,
किंतु बस थोड़ी-सी नमी
बाकी रहने दो।
थोड़ी-सी नमी ही बन जाती
संपूर्ण जीवन का आधार है,
यही बचा सकेगी
वात्सल्य, ममता और प्यार।
थोड़ी-सी नमी पाकर
पत्थर में भी अंकुर फूट जाता है,
थोड़ी-सी नमी मिल जाए तो
मन भी हरिया जाता है।
कोरे पड़े हैं मन के पन्ने सारे,
कुछ तो कहने को अब
कहानी रहने दो।
बस थोड़ी-सी नमी
बाकी रहने दो।
जिस दिन थोड़ी-सी नमी भी
बाकी नहीं रहेगी,
न इंसान रहेगा,
न इंसानियत रहेगी।
न फसलें उग पाएँगी,
न खेत हरियाएँगे,
न होगी पेड़ों की ठंडी छाँव,
न पंछी चहचहा पाएँगे।
सोचो, कोई भी फिर
कैसे जी पाएगा?
नदियों का कलरव,
झरनों की मधुर झंकार रहने दो।
बस थोड़ी-सी नमी
बाकी रहने दो।
नमी नहीं बची तो
हो जाओगे निस्संग,
शुष्क हो जाएगा जीवन,
नहीं रहेगी कोई तरंग।
आँखों में दया, करुणा और
स्नेह का थोड़ा-सा पानी रहने दो।
थोड़ी-सी नमी बाकी रहने दो,
बस थोड़ी-सी नमी
बाकी रहने दो।
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