
सुरेश परिहार
रात के ग्यारह बज रहे थे. रिद्धिमा अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी थी. बाहर हल्की बारिश हो रही थी और उसके हाथ में मोबाइल था. स्क्रीन पर राघव का नाम चमक रहा था. पिछले कुछ दिनों से दोनों की बातचीत तो हो रही थी, लेकिन उन बातचीतों में पहले जैसी सहजता नहीं थी. राघव कोलकाता में था और रिद्धिमा दूसरे शहर में. उनके बीच कई सौ किलोमीटर की दूरी थी, लेकिन उनकी कहानी की सबसे बड़ी चुनौती शहरों के बीच का फासला नहीं, बल्कि उन अनकही बातों की दूरी थी, जो कभी-कभी दो दिलों के बीच आ जाती है.
रिद्धिमा ने मैसेज लिखा- तुम्हें कभी ऐसा लगता है कि हम एक-दूसरे के करीब होते हुए भी बहुत दूर हैं?
राघव ने मैसेज पढ़ा, लेकिन तुरंत जवाब नहीं दिया. वह अपने कमरे की मेज पर रखी अधूरी किताब के पन्ने पलट रहा था. कुछ देर बाद उसने फोन उठाया और लिखा- हाँ, कभी-कभी. लेकिन मुझे यह भी लगता है कि कुछ लोग पास रहकर भी उतने अपने नहीं होते, जितने तुम दूर रहकर हो.
रिद्धिमा ने मैसेज पढ़ा. उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई, लेकिन मन में एक सवाल अब भी था. राघव, क्या सिर्फ बातें करते रहने से कोई रिश्ता हमेशा चल सकता है?
इस बार राघव ने फोन करने का फैसला किया.
हैलो!
हूँ…रिद्धिमा की आवाज में उदासी थी.
क्या हुआ? आज तुम्हारी आवाज में वो बात नहीं है.
कुछ नहीं. तुम्हारा यह कुछ नहीं मुझे बहुत परेशान करता है. जब तुम कहती हो कि कुछ नहीं हुआ, तब मुझे लगता है कि बहुत कुछ हुआ है, बस तुम बता नहीं रही हो.
रिद्धिमा कुछ पल चुप रही. फिर धीरे से बोली- कभी-कभी लगता है कि तुम मेरी बातें सुनते तो हो, लेकिन मेरी भावनाओं तक पहुँच नहीं पाते.
राघव ने उसकी बात बीच में नहीं काटी. वह जानता था कि हर समस्या का जवाब देना जरूरी नहीं होता. कुछ बातों को केवल सुनना चाहिए, बिना सफाई दिए, बिना अपनी बात सही साबित करने की कोशिश किए.
ठीक है, आज तुम बोलो. मैं सिर्फ सुनूँगा.
और उस रात रिद्धिमा बहुत देर तक बोलती रही. उसने अपने अकेलेपन के बारे में बताया, उन दिनों के बारे में बताया जब उसे किसी अपने की जरूरत महसूस होती थी, उन छोटी-छोटी खुशियों के बारे में भी, जिन्हें वह राघव के साथ बाँटना चाहती थी. उसने यह भी कहा कि कभी-कभी उसे डर लगता है कि कहीं उनका रिश्ता केवल फोन की घंटियों और संदेशों तक सिमटकर न रह जाए.
राघव सुनता रहा.
उसने न तो उसे कमजोर कहा, न जरूरत से ज्यादा भावुक. उसने यह भी नहीं कहा कि वह बेवजह सोचती है.
बात खत्म होने पर उसने सिर्फ इतना कहा, रिद्धिमा, मैं तुम्हारे हर डर को खत्म करने का वादा नहीं कर सकता, लेकिन इतना जरूर कह सकता हूँ कि तुम्हारे डर को सुनने से कभी पीछे नहीं हटूँगा.
रिद्धिमा की आँखें नम हो गईं.
तुम्हें पता है, मुझे तुमसे हर समस्या का हल नहीं चाहिए. कभी-कभी बस इतना चाहिए कि तुम मुझे समझने की कोशिश करो.
और मुझे यह समझने की कोशिश करते रहना चाहिए कि तुम्हें कब सलाह चाहिए और कब सिर्फ मेरा साथ.
दोनों हँस पड़े. उस रात उनके बीच कोई बड़ी घोषणा नहीं हुई, न ही हमेशा साथ रहने की कोई फिल्मी कसम खाई गई. फिर भी कुछ बदल गया था. उनके बीच की बातचीत अब केवल दिनभर की घटनाओं का हिसाब नहीं थी, बल्कि एक-दूसरे के भीतर की दुनिया तक पहुँचने का रास्ता बन रही थी. राघव और रिद्धिमा के रिश्ते में आकर्षण था, एक-दूसरे को देखने और पास बैठने की इच्छा भी थी. लेकिन समय के साथ दोनों समझने लगे थे कि प्रेम केवल किसी को पाने की इच्छा नहीं है. प्रेम उस व्यक्ति को उसकी पूरी भावनात्मक सच्चाई के साथ स्वीकार करने का नाम भी है.
रिद्धिमा को अच्छा लगता था जब राघव उसकी छोटी-छोटी बातों को याद रखता. कभी वह पूछ लेता कि आज उसकी तबीयत कैसी है, कभी किसी पुरानी बातचीत का जिक्र कर देता, तो कभी बिना किसी खास वजह के फोन करके कहता, आज तुम्हारी आवाज सुनने का मन था…इन छोटी-छोटी बातों में रिद्धिमा को अपनापन मिलता था.
राघव के लिए भी रिद्धिमा का साथ कुछ ऐसा ही था. काम की उलझनों के बीच जब वह थक जाता, तो उससे बात करके उसे लगता कि कोई ऐसा है जिसके सामने उसे हर समय मजबूत बने रहने की जरूरत नहीं है. वह अपनी असफलताओं, परेशानियों और उन आशंकाओं के बारे में भी बात कर सकता था, जिन्हें वह दूसरों से छिपाकर रखता था.
एक दिन रिद्धिमा ने उससे पूछा, तुम मेरे सामने अपनी परेशानियाँ इतनी आसानी से कैसे बता देते हो?
राघव हँसा, शायद इसलिए कि तुम्हारे सामने मुझे हर बार खुद को सही साबित नहीं करना पड़ता.
और अगर मैं तुम्हारी किसी बात से सहमत न होऊँ तो?
तो तुम असहमत हो सकती हो. प्रेम का मतलब यह तो नहीं कि हम हर बात पर एक जैसा सोचें.
रिद्धिमा ने मुस्कुराते हुए कहा, तुम कभी-कभी बहुत समझदार बातें करने लगते हो.
कभी-कभी? राघव ने हैरानी जताई.
हाँ, बाकी समय तो तुम बस मुझे परेशान करते हो. बदमाश कहीं के…दोनों फिर हँसने लगे.
उनके रिश्ते में प्रेम था, लेकिन उसके साथ दोस्ती भी थी. वे एक-दूसरे को केवल प्रेमी की तरह नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह भी देखने लगे थे, जिसकी अपनी पसंद, अपनी जिम्मेदारियाँ, अपने सपने और अपनी सीमाएँ हैं.
करीब पंद्रह दिनों बाद राघव को कोलकाता से लौटने का मौका मिला. उसने रिद्धिमा को बताया कि वह शाम पाँच बजे वाली ट्रेन से आएगा. रिद्धिमा ने फोन पर सामान्य बने रहने की कोशिश की, लेकिन उस दिन उसने कई बार घड़ी देखी. इतने दिनों तक आवाज में महसूस किए गए अपनत्व को सामने बैठकर महसूस करने का विचार ही उसे बेचैन कर रहा था. जब दोनों मिले, तो कुछ क्षण तक उनके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं था.
राघव सामने खड़ा था. वही चेहरा, वही मुस्कान, वही आँखें, जिन्हें रिद्धिमा अब तक मोबाइल की स्क्रीन पर देखती आई थी. मगर इस बार उनके बीच कोई स्क्रीन नहीं थी, कोई नेटवर्क की समस्या नहीं थी, कोई कॉल कटने का डर नहीं था.
कैसी हो? राघव ने पूछा.
ठीक हूँ.
सच? रिद्धिमा हँस दी. तुम्हें हर बार सच ही क्यों जानना होता है?
क्योंकि तुम्हारा ठीक हूँ और सच में ठीक होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. मुझे तुम्हारी आवाज से ही सब पता लग जाता है.
रिद्धिमा ने उसकी ओर देखा. फिर बिना कुछ कहे उसके करीब आ गई और उसे गले लगा लिया. वह आलिंगन कुछ क्षणों का था, लेकिन उन पंद्रह दिनों की प्रतीक्षा, अनगिनत बातचीतों, अधूरे वाक्यों और मन में छिपी भावनाओं का जैसे उसमें एक साथ ठहराव आ गया. राघव ने उसे सहजता से अपने करीब रखा. उस क्षण किसी को कुछ साबित करने की जरूरत नहीं थी. न प्रेम की गहराई का प्रमाण देना था, न किसी वादे को दोहराना था. कुछ देर बाद रिद्धिमा उससे अलग हुई और मुस्कुराकर बोली, अब समझ आया कि फोन पर तुम्हारी आवाज सुनना और तुम्हारे सामने होना अलग-अलग बातें हैं.
राघव ने कहा, हाँ. लेकिन अगर हम फोन पर एक-दूसरे को समझना नहीं सीखते, तो शायद आज यह मुलाकात भी इतनी अपनी नहीं लगती. रिद्धिमा ने उसकी बात पर सिर हिलाया.
उसने महसूस किया कि शारीरिक निकटता का अपना महत्व है. किसी का हाथ थामना, उसके पास बैठना, उसे गले लगानाये सभी प्रेम की सहज अभिव्यक्तियाँ हो सकती हैं. लेकिन इनकी खूबसूरती तभी है, जब दोनों व्यक्ति सहज हों, एक-दूसरे की इच्छा और सीमाओं का सम्मान करें और किसी पर कोई दबाव न हो.
राघव और रिद्धिमा के लिए वह आलिंगन सिर्फ लंबे समय बाद हुई मुलाकात का भावुक क्षण नहीं था. वह उस भरोसे की अभिव्यक्ति भी था, जिसे दोनों ने अपनी बातचीतों, प्रतीक्षा और एक-दूसरे को समझने की कोशिशों से बनाया था. मुलाकात के बाद राघव को वापस जाना था. विदा लेते समय दोनों जानते थे कि अगली मुलाकात कब होगी, यह निश्चित नहीं है. रिद्धिमा ने पूछा, तुम्हें नहीं लगता कि बार-बार मिलकर फिर दूर हो जाना मुश्किल है?
राघव कुछ देर सोचता रहा.
मुश्किल तो है. लेकिन मैं नहीं चाहता कि हम अपने रिश्ते को केवल मुलाकातों से मापें. मैं चाहता हूँ कि जब हम दूर हों, तब भी तुम अपनी जिंदगी पूरी तरह जियो. अपने दोस्तों से मिलो, अपने काम पर ध्यान दो, अपने सपनों के लिए समय निकालो. और मैं भी ऐसा ही करूँगा. और अगर कभी हम दोनों व्यस्त हो गए? अगर बातें कम होने लगीं?
तो हम बात करेंगे. यह मानकर नहीं चलेंगे कि सामने वाला बदल गया है. पहले समझने की कोशिश करेंगे कि क्या हो रहा है.
रिद्धिमा ने धीरे से कहा, और अगर कभी किसी बात से दुख पहुँचा?
तो उसे छिपाकर रिश्ते में जमा नहीं करेंगे. एक-दूसरे को दोष देने के बजाय समझने की कोशिश करेंगे.
रिद्धिमा मुस्कुराई. उसे अच्छा लगा कि राघव प्रेम को किसी अधिकार की तरह नहीं देखता था. वह उसे अपने जीवन में जगह देना चाहता था, उसकी पूरी जिंदगी पर अधिकार नहीं जमाना चाहता था.
समय बीतता रहा. कभी उनकी बातचीत लंबी होती, कभी दिनभर की व्यस्तता के कारण केवल कुछ संदेशों से काम चल जाता. कभी किसी बात पर असहमति होती, कभी किसी पुराने मजाक पर दोनों देर तक हँसते. उनके रिश्ते में हर दिन रोमांटिक नहीं था, लेकिन हर दिन रोमांस का होना जरूरी भी नहीं था. उन्होंने सीखा कि प्रेम में किसी को बदलने की कोशिश करने के बजाय उसकी बात समझना अधिक जरूरी है. भावनात्मक निकटता का अर्थ यह नहीं कि दोनों हर समय एक-दूसरे की मनःस्थिति समझ ही लें. इसका अर्थ यह है कि जब वे एक-दूसरे को समझ न पाएँ, तब भी बातचीत का दरवाजा बंद न करें. और शारीरिक निकटता का अर्थ भी केवल पास होने की इच्छा नहीं है. उसमें सहजता, सहमति, सुरक्षा और सम्मान शामिल हैं. एक आलिंगन तभी सुंदर है, जब उसमें दोनों की इच्छा हो; एक स्पर्श तभी अपनापन देता है, जब उसमें किसी की सीमा का उल्लंघन न हो.
एक रात फिर राघव और रिद्धिमा फोन पर बात कर रहे थे.
राघव, तुम्हें क्या लगता है, सच्चे प्रेम में दो लोग एक-दूसरे को पूरा करते हैं? राघव ने कहा, मुझे लगता है, दो अधूरे लोगों की तरह एक-दूसरे से चिपककर पूरा होने की कोशिश करने के बजाय, दो स्वतंत्र लोग एक-दूसरे के साथ अपनी जिंदगी को बेहतर बना सकते हैं. मतलब, जहांपनाह, तुम्हें मेरी जरूरत नहीं है? रिद्धिमा ने शरारत से पूछा.
जरूरत और चाहत में फर्क होता है, मैडम. मैं अपनी जिंदगी जी सकता हूँ, लेकिन उसमें तुम्हारा होना उसे ज्यादा खूबसूरत बनाता है.
रिद्धिमा कुछ पल चुप रही. फिर बोली, यह बात तुमने आज अच्छी कही. आज ही क्यों? मैं हमेशा अच्छी बातें करता हूँ. आपने ही मुझे बिगाड़ा, मैं तो शरीफ आदमी था….बस, अब फिर शुरू हो गए!
दोनों की हँसी फोन के उस पार तक पहुँच गई.
रिद्धिमा ने महसूस किया कि उसे ऐसा रिश्ता चाहिए, जिसमें वह प्रेम कर सके, लेकिन अपनी पहचान न खोए; जहाँ वह अपनी कमजोरियाँ बता सके, लेकिन हर समय कमजोर बने रहने के लिए बाध्य न हो; जहाँ उसे अपनापन मिले, लेकिन स्वतंत्रता भी बनी रहे.
राघव के लिए भी प्रेम का अर्थ यही था…किसी के जीवन में इस तरह शामिल होना कि उसका जीवन छोटा न हो, बल्कि और अधिक सुंदर, सहज और अर्थपूर्ण बन जाए. उनके बीच आज भी शहरों की दूरी थी. मिलने की प्रतीक्षा थी. कभी अकेलापन था, कभी अधूरी इच्छाएँ भी थीं. लेकिन अब वे समझने लगे थे कि प्रेम का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि दो लोग कितनी बार मिलते हैं या कितनी देर तक एक-दूसरे का हाथ थामे रहते हैं.
उसका मूल्य इस बात में भी है कि वे एक-दूसरे की भावनाओं को कितनी गंभीरता से लेते हैं, असहमति में कितना सम्मान बनाए रखते हैं, एक-दूसरे की सीमाओं को कितना स्वीकार करते हैं और दूरी के बावजूद रिश्ते को कितना ईमानदार बनाए रखते हैं. रात गहरी हो गई थी. फोन रखने से पहले रिद्धिमा ने पूछा, अगली बार कब मिलोगे?
राघव ने कहा, तारीख अभी तय नहीं है. लेकिन जब मिलेंगे, तो इस बार तुम्हें बहुत देर तक गले लगाऊँगा.
रिद्धिमा हँसी. और अगर मैंने मना कर दिया तो?
राघव भी हँस पड़ा. तो तुम्हारी इच्छा का सम्मान करूँगा. प्रेम है, कोई हक जताने का लाइसेंस नहीं….रिद्धिमा की मुस्कान और गहरी हो गई. इसीलिए तो तुमसे प्रेम है, राघव.
फोन कट गया, लेकिन दोनों के भीतर बातचीत की गर्माहट देर तक बनी रही. शायद सच्चा प्रेम यही है…जहाँ भावनात्मक निकटता किसी को समझने का साहस देती है, शारीरिक निकटता दोनों की सहज इच्छा से जन्म लेती है और सम्मान दोनों के बीच की सबसे मजबूत कड़ी बन जाता है. क्योंकि प्रेम का सबसे सुंदर रूप वह नहीं, जिसमें दो लोग हर समय एक-दूसरे के पास रहें, बल्कि वह है जिसमें दूर रहकर भी वे एक-दूसरे के मन, स्वतंत्रता और गरिमा के करीब बने रहें.
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