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माँ दुर्गा की आराधना: नवरात्रि पूजा के प्रमुख विधान

नवरात्रि पूजा में कलश स्थापना, नारियल, आम के पत्ते और जलता हुआ दीपक नवरात्रि के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त में घटस्थापना के साथ माँ दुर्गा की आराधना आरंभ होती है।

प्रतिभा पांडेय प्रति चैन्नई

शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना के साथ शुरू होता है नवरात्रि अनुष्ठान, अष्टमी पर कन्या पूजन और नवमी या दशमी को मुहूर्तानुसार व्रत का पारण

पितृपक्ष की अमावस्या के बाद शारदीय नवरात्रि का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। घरों और मंदिरों में साफ-सफाई, पूजा की तैयारियों और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व होता है। नवरात्रि का शुभारंभ विधि-विधान से घटस्थापना यानी कलश स्थापना के साथ किया जाता है।
घटस्थापना का विशेष महत्व
नवरात्रि के पहले दिन शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना की जाती है। इसे शांति कलश भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलश स्थापना के साथ ही दुर्गा पूजा के अनुष्ठान का आरंभ होता है। इसलिए घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है।परंपरा के अनुसार, पूजा स्थल की सफाई के बाद मिट्टी में जौ बोए जाते हैं। कलश में जल भरकर उसके ऊपर आम के पत्ते रखे जाते हैं और मौली तथा चुनरी से सजा नारियल स्थापित किया जाता है। इसके बाद सिंदूर, अक्षत, कुमकुम, गुड़हल के फूल, अन्य लाल पुष्प, ऋतु फल और मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं। देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने के बाद अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है।
नौ दिनों तक मंत्र जाप और दुर्गा पाठ
नवरात्रि के नौ दिनों में श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और संकल्प के अनुसार मंत्र जाप, दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। प्रतिदिन माँ दुर्गा की आरती और पूजा के बाद क्षमा प्रार्थना करने की भी परंपरा है। शाम के समय विशेष पूजा के साथ पचरा गाकर माता की आराधना की जाती है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और संकल्प के अनुसार खान-पान के नियमों का पालन करते हैं। कई परिवारों में नौ दिनों तक नमक का त्याग किया जाता है तथा भोजन में लहसुन और प्याज का इस्तेमाल नहीं किया जाता।
अष्टमी पर कन्या पूजन की परंपरा
नवरात्रि की अष्टमी को माँ गौरी की पूजा के साथ कन्या पूजन किया जाता है। इसे कंजक पूजन भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कन्याओं को माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर उनका पूजन किया जाता है। परंपरा में सामान्यतः दो से दस वर्ष तक की कन्याओं को आमंत्रित कर भोजन कराया जाता है। कई परिवारों में उनके साथ एक बालक को भी भैरव के प्रतीक के रूप में पूजन में शामिल किया जाता है, जिसे लंगूर कहा जाता है।
कन्या पूजन में सर्वप्रथम कन्याओं और बालक के पैर धोकर उन्हें आसन पर बैठाया जाता है। इसके बाद तौलिए से पैर पोंछकर तिलक लगाया जाता है और चुनरी ओढ़ाकर आरती की जाती है। देवी को भोग लगाने के बाद कन्याओं और बालक को भोजन कराया जाता है। भोजन के बाद उन्हें फल, दक्षिणा और उपहार दिए जाते हैं। अंत में उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है और सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है।
यदि किसी कारणवश नौ कन्याओं को आमंत्रित करना संभव न हो, तो अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार उपलब्ध कन्याओं का पूजन भी किया जाता है। इस परंपरा में संख्या से अधिक श्रद्धा, सम्मान और सेवा भाव को महत्व दिया जाता है।
नवमी या दशमी को व्रत का पारण

नवरात्रि के नौ दिनों की पूजा-अर्चना के बाद व्रत का पारण स्थानीय परंपरा और पंचांग के अनुसार नवमी या दशमी को किया जाता है। इस प्रकार घटस्थापना से लेकर कन्या पूजन और व्रत पारण तक पूरा पर्व भक्ति, संयम और श्रद्धा के साथ संपन्न होता है। नवरात्रि केवल पूजा-अर्चना का पर्व नहीं, बल्कि शक्ति की उपासना, आत्मसंयम और नारी सम्मान का संदेश देने वाला अवसर भी है। इन नौ दिनों में श्रद्धालु माँ दुर्गा की आराधना कर परिवार और समाज की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
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