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स्त्री-पुरुष के रिश्ते में नफरत नहीं, सम्मान जरूरी

स्त्री और पुरुष समानता, सम्मान और विश्वास के साथ एक-दूसरे के पूरक नर और नारी एक-दूसरे के पूरक
meena singh

मीना सिंह, संगरुर (पंजाब)

आजकल नर के लिए नारी के विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। अजीब-से नारे सुनाई दे रहे हैं, जैसे—एक कचौड़ी, दो समोसा, मर्द जात पर मत करो भरोसा।

ये सब सुनकर लगता है कि यह विरोध किससे और क्यों है। वक्त साक्षी है कि युद्धों में पुरुषों ने स्त्रियों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। जब कोई आपदा आती है, तो पुरुष पहले स्त्रियों और बच्चों को बचाते हैं। कई बार इसमें उनकी जान भी चली जाती है। पुरुष अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए दिन-रात मेहनत करता है। अपनी ज़रूरतों को दरकिनार करके परिवार के सदस्यों की हर ज़रूरत पूरी करता है।

लेकिन कुछ पुरुषों के भेष में छिपे हुए भेड़ियों की वजह से हम सारी पुरुष जाति को कटघरे में नहीं खड़ा कर सकते हैं।

हमारे समाज में आज पुरुषों द्वारा की जा रही कुछ घटनाएँ दिल को चीरकर रख देती हैं। पर ये आम पुरुष नहीं हैं, ये अपराधी हैं। इन अपराधियों को सज़ा तो आम जनमानस दिलवाना ही चाहता है, फिर चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा और उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई आवश्यक है।

नारी के साथ जो दुर्व्यवहार करते हैं, वे किसी-न-किसी के बेटे, पति या पिता तो होते ही हैं। किसी-न-किसी परिवार से होते हैं। उनकी परवरिश और माहौल में कोई-न-कोई कमी तो रहती होगी, जो उन्हें इतना हिंसक बनाती है। मेरी गुज़ारिश है नारी रूपी माताओं और बहनों से कि उन्हें अपने बच्चों में बचपन से ऐसे संस्कार विकसित करने होंगे, जो उन्हें स्त्री की गरिमा, स्वतंत्रता और अधिकारों का सम्मान करना सिखाएँ। स्त्रियों की असहमति का सम्मान करना भी उनकी ज़िम्मेदारी है। बेटियों को भी आत्मनिर्भर और अपने अधिकारों के प्रति सजग करना होगा।

केवल कानून बदलने से ही समाज नहीं बदलता है, इसके लिए मानसिकता में बदलाव भी ज़रूरी है। मानसिकता बदलने में थोड़ा विलंब हो सकता है, पर जब वह बदलेगी, तो ऐसे सभ्य और स्वस्थ समाज का निर्माण होगा, जहाँ नारी भयमुक्त होकर जी सके।

हमारी सृष्टि का संतुलन ही नर और नारी के भरोसे और प्रेम से है। परिवार और समाज के निर्माण में दोनों की समान भागीदारी है, लेकिन कुछ प्रयास नारी को और कुछ प्रयास नर को एक-दूसरे की भावनाओं को समझने के लिए करने होंगे। तब वह दिन दूर नहीं, जब आधुनिक सोच वाले समाज का निर्माण होगा, जहाँ स्त्री और पुरुष की बराबर भागीदारी होगी। तब वे एक ही गाड़ी के दो पहिए और एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाएँगे। एक-दूसरे के लिए नफ़रत नहीं, प्यार और भरोसा होगा। तभी वे एक-दूसरे के सच्चे पूरक बन जाएँगे।
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