
किश्वर अंजुम, भिलाई
“क्या हुआ गुल अफ़रोज़! सुना है तुम्हारे घर चोर आए थे।” मैंने हमदर्दी से गुल से पूछा।
“हाँ, आए तो थे, मगर जाग हो गई तो भाग गए!” गुल ने कहा।
“चलो, अच्छा हुआ, कुछ ले जा नहीं पाए निकम्मे, नामाक़ूल! किसी की मेहनत की कमाई पर हाथ डालते इन्हें ख़ौफ़-ए-ख़ुदा भी नहीं होता, बाबा!” मैंने ख़ुदकलामी की और शायद गुल मेरी बात समझ गई।
“इन चोरों की तो फिर भी बख़्शिश हो ही जाएगी, निदा! उनका क्या होगा, जो किसी के जान से भी क़ीमती रिश्ते चुराते हैं?” गुल ने मुझसे सवाल किया।
मैं इसी ज़िक्र से बचना चाह रही थी, जो गुल ने छेड़ ही दिया आख़िर, और वजह यही थी कि मेरे पास उसके सवाल का कोई जवाब नहीं था, क्योंकि उसकी ख़ुशियाँ, उसका सबसे अज़ीज़ रिश्ता चुराने वाली भी मेरी ही अपनी थी।
“तुम्हें पहले मुझसे ज़िक्र करना था न, गुल! तुम भी तो सब कुछ होने के बाद होश में आईं! क्या समझ नहीं पाई थीं कि क्या हो रहा है?” मैंने अफ़सोस से कहा।
“तुम्हें क्या लगता है, मैं समझ नहीं रही थी कि सेंध लगाई जा रही है?” गुल ने ख़ला को घूरते हुए जवाब दिया।
“तो फिर कहा क्यों नहीं!”
“क्योंकि मुझे भरोसा था ख़ुद से ज़्यादा उस पर!”
“और अब! क्या सोचा है!”
“अब?” गुल के रुख़ पर नाचार-सा तबस्सुम उसकी अंदरूनी तोड़फोड़ को दिखा रहा था।
एक गहरी साँस लेकर उसने कहा, “अब! शुक्र का सजदा करती हूँ कि अल्लाह वो जानता है, जो हम नहीं जानते!”
“तो फिर रंग पीला क्यों है तुम्हारा? ये ख़ुद को ग़मज़दा तस्वीर क्यों बनाया हुआ है?” मैंने माहौल हल्का करने की ग़रज़ से कहा।
“क्योंकि, तस्वीर से रंग छीन लिए गए हैं, निदा! अपने दिल के लहू से उसमें रंग भर रही हूँ, इसलिए पीली नज़र आ रही हूँ।”
गुल के दिल की बगिया फिर से खिल जाएगी, लेकिन उसका क्या होगा, जिसने उसकी ख़ुशियाँ चुराई हैं?
मुझे उसके अंजाम की फ़िक्र है, जो भी हो, वो भी मेरी अपनी ही है।
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