
मीना सिंह, संगरुर (पंजाब)
ज़रा भी लाज-शर्म नहीं, कैसी हैं आजकल की लड़कियाँ!
ज़रा भी नहीं हैं सहतीं, कैसी हैं आजकल की लड़कियाँ!
हमने तो इतना सहा, इतने दब-ढककर रहे,
ये तो कुछ सुनती ही नहीं,
कैसे घर-परिवार संभालेंगी आजकल की लड़कियाँ?
जहाँ भी कुछ भूतपूर्व लड़कियाँ मिलती हैं,
यही बातें करके जी भर बुराई करती हैं
और अपनी पीढ़ी का बखान करते नहीं थकतीं।
ऐसा लगता है कि वे हों देवियाँ,
आजकल की लड़कियाँ हों जैसे बलाएँ!
क्यों भूल जाती हैं वे, यही तो है जेनरेशन गैप।
दिल पर रखो हाथ और कहो,
तुम्हें नहीं होती खुशी
आजकल की अडिग, साहसी लड़कियाँ देखकर?
आह नहीं निकलती कभी उनके स्टाइल देखकर?
सहनशक्ति माना उनमें थोड़ी कम है,
पर सही को सही, गलत को गलत कहने का
दम रखती हैं आजकल की लड़कियाँ।
गर पुरानी पीढ़ी ने बहुत कुछ है सहा,
पर इस बात की आज की पीढ़ी को क्यों सहे सज़ा?
अब वो सहमी-सकुचाती अबला नहीं,
आत्मविश्वास से लबरेज़ नारी शक्तियाँ हैं,
आजकल की लड़कियाँ!
कौन क्या कहता है, इस पर कान नहीं धरती हैं,
आजकल की लड़कियाँ।
बराबरी का हक माँगती नहीं, लेती हैं,
आजकल की लड़कियाँ।
मत सोचो कैसी हैं आजकल की लड़कियाँ,
बस जैसी भी हैं, अच्छी और निडर हैं आजकल की लड़कियाँ।
नहीं रोक सकेगा कोई उनकी परवाज़ अब,
उड़कर छू लेंगी आसमान,
आजकल की लड़कियाँ!
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