ऋतु बसंत आयो री…
“ऋतु बसंत आयो री” प्रकृति के नवजीवन, प्रेम और उल्लास का काव्यात्मक उत्सव है। शीतल बयार, खिले सुमन, कोयल की कूक और मन के हिलोर के माध्यम से यह कविता बसंत ऋतु की जीवंत अनुभूति कराती है।

“ऋतु बसंत आयो री” प्रकृति के नवजीवन, प्रेम और उल्लास का काव्यात्मक उत्सव है। शीतल बयार, खिले सुमन, कोयल की कूक और मन के हिलोर के माध्यम से यह कविता बसंत ऋतु की जीवंत अनुभूति कराती है।
यह कविता नारी के महत्व, उसकी शक्ति और समाज में उसके सम्मान की आवश्यकता पर केंद्रित है। लाल चुनरी से सजा माँ का दरबार और नौ दिन की पूजा नारी की भक्ति और महिमा को दर्शाते हैं। कविता यह बताती है कि सृष्टि नारी के बिना नहीं चलती और जहाँ नारी का अपमान होता है, वहाँ पूजा-पाठ व्यर्थ है। विता में यह संदेश भी है कि नारी को कभी कमजोर नहीं बनना चाहिए। यदि उसके आत्म-सम्मान पर चोट पहुँचती है, तो उसे काली या चंडी के रूप में दुष्टों का विनाश करना चाहिए। साथ ही यह भी उजागर किया गया है कि आज भी कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियाँ जारी हैं और बेटियों की सुरक्षा समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर, यह कविता नारी सम्मान, शक्ति, साहस और जागरूकता का संदेश देती है।
मध्य रेल के मुंबई मंडल पर रविवार 21 दिसंबर 2025 को इंजीनियरिंग और रखरखाव कार्यों के चलते मेगा ब्लॉक रहेगा. ठाणे–कल्याण मेन लाइन, हार्बर और ट्रांस हार्बर लाइनों पर लोकल, मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों की सेवाएं प्रभावित होंगी. यात्रियों से वैकल्पिक व्यवस्था अपनाने और सहयोग करने की अपील की गई है.
रात की निस्तब्धता में प्रेम का प्रश्न भीतर गूंज रहा था। संगीत की सधी स्वर लहरियाँ मन को ऐसे छू गईं कि सब तर्क-वितर्क, प्रश्न-उत्तर उस तकिए पर ढुलकी एक बूंद में विलीन हो गए… जैसे प्रेम समझाने का नहीं, केवल महसूस करने का विषय हो।
गाँव की छोटी-सी झोंपड़ियों और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को उजागर करती है। अँधियारे में एक मृतप्राय दीपशिखा की तरह जीवन की झलक कहीं तहखाने में बंद पड़ी है। नेता केवल दिखावे के लिए चमक-धमक करते हैं, पर जब बत्ती बुझी होती है तो लालटेन भी घर को रोशन नहीं कर सकती। इसके बावजूद, झोपड़ी में रहने वाले कृशकाय लोग रातों को इस छोटी डिबरी-सी लालटेन की रौशनी से जीवन की आशा और संघर्ष को देख पाते हैं। यह कविता सामाजिक असमानता, संघर्ष और छोटे प्रकाश की महत्वता को सुंदर ढंग से चित्रित करती है।
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रस्तुत यह प्रेरक लेख माता-पिता, गुरु और धरती माँ के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और सम्मान का संदेश देता है। लेख में माँ के वात्सल्य, पिता के त्याग, धरती माँ के उपकार तथा गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान और जीवन-दर्शन का भावपूर्ण वर्णन किया गया है। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को रेखांकित करते हुए यह लेख पाठकों को अपने जीवन के सभी गुरुओं का सम्मान करने और उनके प्रति आभार व्यक्त करने की प्रेरणा देता है।
कुछ लड़कियाँ अपने सपने छोड़ती नहीं, बस वक्त और जिम्मेदारियों के नीचे छिपा देती हैं। यह कहानी एक ऐसी ही लड़की की है, जिसने परिस्थितियों से समझौता किया, लेकिन अपने भीतर की पहचान को कभी मरने नहीं दिया।
माँ जो बिना कहे हर दुख समेट लेती है और हर सुख में चुपचाप पास खड़ी रहती है। माँ की उपस्थिति यहाँ दूरी से परे, स्मृति और आत्मा में रची-बसी हुई है—ऐसी शक्ति जो कभी जुदा नहीं होती।
“देश की धरा” एक वैचारिक और संस्कृतनिष्ठ कविता है, जो भारत की सनातन चेतना, वैदिक परंपरा और मानवतावादी दृष्टि को शब्दों में उकेरती है।
लहरों, तूफ़ानों और गहराइयों के माध्यम से सागर से संवाद करती यह कविता जीवन के संघर्ष, धैर्य और हर हार के बाद नई शुरुआत का साहस देती है।