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अमरनाथ यात्राः जहां सांस लेता है शिव

केदारनाथ यात्रा के बाद आत्मा जैसे हिमालय की ओर फिर खिंच गई थी। 9 जुलाई 2024 को नागदा से शुरू हुई हमारी अमरनाथ यात्रा भक्ति, रोमांच और व्यवस्था से भरी रही। जम्मू के भगवती नगर बेस कैंप तक का सफर, यात्रा कार्ड बनवाने की प्रक्रिया और सेवाभाव से परिपूर्ण भंडारे—हर क्षण अविस्मरणीय अनुभव बन गया।

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सुबह की धूप में आँगन, तुलसी पर चमकती ओस, मुंडेर पर बैठे कबूतर और शांत घरेलू वातावरण का काव्यात्मक दृश्य।

जीवन-सौंदर्य

आले में रखी नीली शीशी, हवा से हिलता अख़बार, तुलसी पर ठहरी ओस, बारिश की स्मृतियाँ और समय का अविराम प्रवाह यह कविता बताती है कि जीवन का वास्तविक सौंदर्य बड़े क्षणों में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की साधारण दिखने वाली अनुभूतियों में छिपा होता है।

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एक नीली सी नदी..

बरसों के अंतराल में, उस समय तुम बिना किसी रोक-टोक के प्रेम में डूबे थे, और मैं भी उसी प्रेम में भीग रही थी। तुम्हें नीला रंग पसंद था, और मैं नीलम की तरह दमक रही थी। हमारे शब्द एक मधुर लय में बह रहे थे, जैसे दो प्रेमी अपने सपनों के गीत गा रहे हों। मैं प्रेम की नदी बनी थी, और तुम, पुरुष, बांध बनाने के लिए पत्थर चुनने लगे। हमारे गीत उन पत्थरों से टकरा कर शब्द बनाते रहे, फिर धीरे-धीरे बिखर गए। तुम लगातार बरसते रहे, और मैं सूख गई।
सुनो पुरुष, प्रेम के घर बांधों से नहीं बनते, ये बहती नदी के नावों पर बनते हैं। व्यस्त हाथों के बावजूद, उस सूखी जमीन के भीतर अब भी एक नीली-सी नदी बह रही है। क्योंकि प्रेम में खो जाना भी प्रेम में होना ही माना जाता है।

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विटामिन डी सिर्फ हड्डियों का नहीं, दिमाग, दिल और इम्यून सिस्टम का भी छुपा रक्षक

सिर्फ हड्डियों का नहीं विटामिन डी

थकान, डिप्रेशन और दिल से जुड़ा अनदेखा रिश्ता भारत को सूरज का देश कहा जाता है, फिर भी एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने है. हर दस में से लगभग आठ भारतीयों में विटामिन डी की कमी पाई जाती है. वर्षों तक हमें यही सिखाया गया कि विटामिन डी केवल हड्डियों के लिए जरूरी है. सच…

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जीवन के कठिन मार्ग पर अकेला चलता एक व्यक्ति, चारों ओर घना जंगल और पथरीला रास्ता, संघर्ष और आत्मचिंतन का प्रतीकात्मक दृश्य।

ज़िंदगी

ज़िंदगी जितनी सरल दिखाई देती है, उतनी होती नहीं। यह कविता जीवन के संघर्ष, रिश्तों की बदलती परिभाषा, मोह-माया और मानव अनुभवों की गहराइयों को भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करती है।

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पुनर्जन्म…

बस से मसूरी की यात्रा पर निकली साक्षी अपने परिवार के साथ मंदिर पहुँचती है। जैसे ही वह मंदिर के अहाते में कदम रखती है, एक बूढ़ा व्यक्ति उसे देखकर दौड़ा चला आता है और कहता है — “बिटिया, तू आ गई! मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था।”
सब हैरान रह जाते हैं। बूढ़ा एक पुरानी तस्वीर दिखाता है . उसमें साक्षी जैसी ही एक लड़की थी, नाम लिखा था “नूरी”। बूढ़े की आँखों में आँसू हैं, और साक्षी के मन में एक अनजाना कंपन।
क्या यह महज़ संयोग है, या सचमुच किसी पुनर्जन्म की कहानी शुरू हो चुकी है?

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तिरंगा – हमारा मान

भारत में “तिरंगा” शब्द भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को संदर्भित करता है। हर स्वतंत्र राष्ट्र का अपना ध्वज होता है, जो उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज को उसके वर्तमान स्वरूप में 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता से कुछ दिन पहले, 22 जुलाई 1947 को आयोजित संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था। यह 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में और उसके बाद भारत गणराज्य के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में कार्य करता रहा।

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एक शरारत हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई | मित्र गिरधारी अरोरा को श्रद्धांजलि

एक शरारत हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई

कभी क्रिकेट के मैदान में अपनी स्पिन गेंदों से दोस्तों को छेड़ने वाला, तो कभी अपनी हँसी और शरारतों से हर महफ़िल को जीवंत बना देने वाला गिरधारी अरोरा अब सिर्फ़ यादों में बस गया है। कॉलेज के दिनों की दोस्ती, जनता एक्सप्रेस के सफ़र, महिदपुर रोड की गलियाँ और अनगिनत शरारतें आज भी दिल में ज़िंदा हैं। यह संस्मरण एक ऐसे दोस्त को श्रद्धांजलि है, जिसके जाने से यादों का एक पूरा दौर हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया।

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वह अफ़साना…

अश्विन सर, मुझे लेकर, कहां जा रहे हैं ? और क्यों ? छोटा शहर है, किसी ने मुझे इनके साथ देख लिया तो न जाने मेरे बारे में क्या सोचेगा ।
सर, ने मुझे एक एंप्लॉय से ज्यादा दोस्त समझा, मुझ पर विश्वास किया, और अपनी कुछ ऐसी बातें शेयर की जो वह शायद किसी और से कह नहीं सकते थे….. लेकिन उन्होंने जो कहा उसे सुनकर मैं सकते में आ गई …….. दोस्त समझा तो सही सलाह देना मेरा फर्ज था

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खेत में थ्रेसर मशीन के साथ काम करते थके हुए मजदूर, जोखिम भरा माहौल

रोटी की दौड़ में मौत का खतरा: थ्रेसर बन रहा काल

श के ग्रामीण इलाकों में गेहूं की कटाई और मड़ाई के दौरान थ्रेसर मशीनों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। जहां ये मशीनें किसानों की मेहनत को आसान बनाती हैं, वहीं इनके कारण होने वाले हादसों में भी लगातार वृद्धि देखी जा रही है। यह घटनाएं केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे कई परिवारों का दर्द और टूटते सपने छिपे होते हैं।

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